भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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अग्रे वाचयति प्रभञ्जनसुते तत्त्वं मुनिभ्यः परं व्याख्यान्तं भरतादिभिः परिवृतं रामं भजे श्यामलम्॥ वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान् पश्चात् सुमित्रासुतः शत्रुघ्नो भरतश्च पार्श्वदलयोर्वाय्वादिकोणेषु च। सुग्रीवश्च विभीषणश्च युवराट् तारासुतो जाम्बवान् मध्ये नीलसरोजकोमलरुचिं रामं भजे श्यामलम्॥

श्रीरामपरिकरको नमस्कार

रामं रामानुजं सीतां भरतं भरतानुजम्।
सुग्रीवं वायुसूनुं च प्रणमामि पुनः पुनः॥
नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै।
नमोऽस्तु रुद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो नमोऽस्तु चन्द्रार्कमरुद्गणेभ्यः॥

रामायणको नमस्कार

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥
वाल्मीकिगिरिसम्भूता रामाम्भोधिसंगता।
श्रीमद्रामायणी गङ्गा पुनाति भुवनत्रयम्॥
वाल्मीकेर्मुनिसिंहस्य कवितावनचारिणः।
शृण्वन् रामकथानादं को न याति परां गतिम्॥

पाठ आरम्भ करनेके बाद अध्यायके बीचमें रुकना नहीं चाहिये। रुक जानेपर फिर उसी अध्यायको आरम्भसे पढ़ना चाहिये। मध्यम स्वरसे, स्पष्ट उच्चारण करते हुए श्रद्धा तथा प्रेमसे पाठ करना चाहिये। गीत गाकर, सिर हिलाकर, जल्दबाजीसे तथा बिना अर्थ समझे पाठ करना ठीक नहीं है। संध्या-समय निम्नलिखित स्थलोंपर प्रतिदिन विश्राम करते जाना चाहिये।

प्रथम दिन अयोध्याकाण्डके ६ ठे सर्गकी समाप्तिपर
प्रथम विश्राम

द्वितीय ,, ,, ८०वें ,, ,, द्वितीय ,,
तृतीय ,, अरण्यकाण्डके २०वें ,, ,, तृतीय ,,