भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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चतुर्थ ,,किष्किन्धाकाण्डके४६ वें सर्गकी समाप्तिपर चतुर्थ विश्राम

पञ्चम ,,सुन्दरकाण्डके ४७ वें ,, ,, पञ्चम ,,
षष्ठ ,, युद्धकाण्डके ५०वें ,, ,, षष्ठ ,,
सप्तम ,, ,, ९९ वें ,, ,, सप्तम ,,
अष्टम ,, उत्तरकाण्ड ३६ वें ,, ,, अष्टम ,,
नवम ,, ,, अन्तिम सर्गके बाद पुनः युद्ध-काण्डका अन्तिम सर्ग पढ़कर विश्राम करना चाहिये।^५

इसके अन्य भी विश्रामस्थल हैं। एक पारायण-क्रम ऐसा भी है, जिसमें उत्तरकाण्डका पाठ नहीं किया जाता।

उसके विश्रामस्थल क्रमशः इस प्रकार हैं—

प्रथम दिवस बालकाण्डके ७७ वेंसर्गकी समाप्तिपर
द्वितीय ,, अयोध्याकाण्डके ६० वें ,,
तृतीय ,, ,, ११९ वें ,,
चतुर्थ ,, अरण्यकाण्डके ६८ वें ,,
पञ्चम ,, किष्किन्धाकाण्डके ४९ वें ,,
षष्ठ ,, सुन्दरकाण्डके ५६ वें ,,
सप्तम ,, युद्धकाण्डके ५० वें ,,
अष्टम ,, ,, १११ वें ,,
नवम ,, ,, १३१ वें ,,

प्रतिदिन कथा-समाप्तिके समय निम्नाङ्कित श्लोकोंके द्वारा मङ्गलाशासन करके पारायण पूरा करे।

स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां
न्याय्येन मार्गेण महीं महीशाः।
गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं
लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥