भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 822, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 822

‘सत्यवान्‌की पत्नी सावित्री पतिकी सेवा करके ही स्वर्गलोकमें पूजित हो रही हैं। उन्हींके समान बर्ताव करनेवाली आप (अनसूया देवी) ने भी पतिकी सेवाके ही प्रभावसे स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया है॥ १०॥

‘सम्पूर्ण स्त्रियोंमें श्रेष्ठ यह स्वर्गकी देवी रोहिणी पतिसेवाके प्रभावसे ही एक मुहूर्त्तके लिये भी चन्द्रमासे बिलग होती नहीं देखी जाती॥ ११॥

‘इस प्रकार दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्य-धर्मका पालन करनेवाली बहुत-सी साध्वी स्त्रियाँ अपने पुण्यकर्मके बलसे देवलोकमें आदर पा रही हैं’॥ १२॥

तदनन्तर सीताके कहे हुए वचन सुनकर अनसूयाको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने उनका मस्तक सूँघा और फिर उन मिथिलेशकुमारीका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा— ‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सीते! मैंने अनेक प्रकारके नियमोंका पालन करके बहुत बड़ी तपस्या संचित की है। उस तपोबलका ही आश्रय लेकर मैं तुमसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहती हूँ॥ १४॥

‘मिथिलेशकुमारी सीते! तुमने बहुत ही युक्तियुक्त और उत्तम वचन कहा है। उसे सुनकर मुझे बड़ा संतोष हुआ है, अतः बताओ मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?’॥

उनका यह कथन सुनकर सीताको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे तपोबलसम्पन्न अनसूयासे मन्द-मन्द मुसकराती हुईं बोलीं— ‘आपने अपने वचनोंद्वारा ही मेरा सारा प्रिय कार्य कर दिया, अब और कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं है’॥

सीताके ऐसा कहनेपर धर्मज्ञ अनसूयाको बड़ी प्रसन्नता हुईं। वे बोलीं— ‘सीते! तुम्हारी निर्लोभतासे जो मुझे विशेष हर्ष हुआ है (अथवा तुममें जो लोभहीनताके कारण सदा आनन्दोत्सव भरा रहता है), उसे मैं अवश्य सफल करूँगी॥ १७॥

‘यह सुन्दर दिव्य हार, यह वस्त्र, ये आभूषण, यह अङ्गराग और बहुमूल्य अनुलेपन मैं तुम्हें देती हूँ। विदेह-नन्दिनि सीते! मेरी दी हुईं ये वस्तुएँ तुम्हारे अङ्गोंकी शोभा बढ़ायेंगी। ये सब तुम्हारे ही योग्य हैं और सदा उपयोगमें लायी जानेपर निर्दोष एवं निर्विकार रहेंगी॥

‘जनककिशोरी! इस दिव्य अङ्गरागको अङ्गोंमें लगाकर तुम अपने पतिको उसी प्रकार सुशोभित करोगी, जैसे लक्ष्मी अविनाशी भगवान् विष्णुकी शोभा बढ़ाती है’॥

अनसूयाकी आज्ञासे धीर स्वभाववाली यशस्विनी मिथिलेशकुमारी सीताने उस वस्त्र, अङ्गराग, आभूषण और हारको उनकी प्रसन्नताका परम उत्तम उपहार समझकर ले लिया। उस प्रेमोपहारको ग्रहण करके वे दोनों हाथ जोड़कर उन तपोधना अनसूयाकी सेवामें बैठी रहीं॥