श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 823, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीतासे दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली अनसूयाने कोई परम प्रिय कथा सुनानेके लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—॥ २३ ॥
‘सीते! इन यशस्वी राघवेन्द्रने तुम्हें स्वयंवरमें प्राप्त किया था, यह बात मेरे सुननेमें आयी है॥ २४ ॥
‘मिथिलेशनन्दिनि! मैं उस वृत्तान्तको विस्तारके साथ सुनना चाहती हूँ। अतः जो कुछ जिस प्रकार हुआ, वह सब पूर्णरूपसे मुझे बताओ’॥ २५ ॥
उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर सीताने उन धर्मचारिणी तापसी अनसूयासे कहा—‘माताजी! सुनिये।’ ऐसा कहकर उन्होंने उस कथाको इस प्रकार कहना आरम्भ किया—
‘मिथिला जनपदके वीर राजा ‘जनक’ नामसे प्रसिद्ध हैं। वे धर्मके ज्ञाता हैं, अतः क्षत्रियोचित कर्ममें तत्पर रहकर न्यायपूर्वक पृथ्वीका पालन करते हैं॥ २७ ॥
‘एक समयकी बात है, वे यज्ञके योग्य क्षेत्रको हाथमें हल लेकर जोत रहे थे; इसी समय मैं पृथ्वीको फाड़कर प्रकट हुई। इतनेमात्रसे ही मैं राजा जनककी पुत्री हुई॥
‘वे राजा उस क्षेत्रमें ओषधियोंको मुट्ठीमें लेकर बो रहे थे। इतनेहीमें उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। मेरे सारे अङ्गोंमें धूल लिपटी हुई थी। उस अवस्थामें मुझे देखकर राजा जनकको बड़ा विस्मय हुआ॥ २९ ॥
‘उन दिनों उनके कोई दूसरी संतान नहीं थी, इसलिये स्नेहवश उन्होंने स्वयं मुझे गोदमें ले लिया और ‘यह मेरी बेटी है’ ऐसा कहकर मुझपर अपने हृदयका सारा स्नेह उड़ेल दिया॥ ३० ॥
‘इसी समय आकाशवाणी हुई, जो स्वरूपतः मानवी भाषामें कही गयी थी (अथवा मेरे विषयमें प्रकट हुई वह वाणी अमानुषी—दिव्य थी)। उसने कहा—‘नरेश्वर! तुम्हारा कथन ठीक है, यह कन्या धर्मतः तुम्हारी ही पुत्री है’॥
‘यह आकाशवाणी सुनकर मेरे धर्मात्मा पिता मिथिलानरेश बड़े प्रसन्न हुए। मुझे पाकर उन नरेशने मानो कोई बड़ी समृद्धि पा ली थी॥ ३२ ॥
‘उन्होंने पुण्यकर्मपरायणा बड़ी रानीको, जो उन्हें अधिक प्रिय थीं, मुझे दे दिया। उन स्नेहमयी महारानीने मातृसमुचित सौहार्दसे मेरा लालन-पालन किया॥ ३३ ॥