भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 90

वहाँ जाकर मैंने पानी पिया और उसके तटपर बैठकर अपनी थकावट दूर की। फिर कुछ वृक्षोंकी जड़ें उखाड़कर उनके द्वारा अपनी भूख बुझायी॥ ३५ ॥

वसिष्ठके उस आश्रमके पास ही मैं निवास करने लगा। टूटी-फूटी स्फटिक-शिलाओंको जोड़कर मैंने वहाँ दीवार खड़ी की॥ ३६ ॥

फिर पत्तों, तिनकों और काष्ठोंद्वारा एक सुन्दर घर बना लिया। उसी घरमें रहकर मैं व्याधोंकी वृत्तिका आश्रय ले नाना प्रकारके मृगोंको मारकर उन्हींके द्वारा बीस वर्षोंतक अपनी जीविका चलाता रहा॥ ३७ १/२ ॥

तदनन्तर मेरी ये साध्वी पत्नी वहाँ मेरे पास आयीं। पूर्वजन्ममें इनका नाम काली था। काली निषादकुलकी कन्या थी और विन्ध्यप्रदेशमें उत्पन्न हुई थीं। उसके भाई-बन्धुओंने उसे त्याग दिया था। वह दुःखसे पीड़ित थी। उसका शरीर वृद्ध हो चला था॥ ३८-३९ ॥

ब्रह्मन्! वह भूख-प्याससे शिथिल हो गयी थी और इस सोचमें पड़ी थी कि भोजनका कार्य कैसे चलेगा? दैवयोगसे घूमती-घामती वह उसी निर्जन वनमें आ पहुँची, जिसमें मैं रहता था॥ ४० ॥

गर्मीका महीना था। बाहर इसे धूप सता रही थी और भीतर मानसिक संताप अत्यन्त पीड़ा दे रहा था। इस दुःखिनी नारीको देखकर मेरे मनमें बड़ी दया आयी॥ ४१ ॥

मैंने इसे पीनेके लिये जल तथा खानेके लिये मांस और जंगली फल दिये। ब्रह्मन्! काली जब विश्राम कर चुकी, तब मैंने उससे उसका यथावत् वृत्तान्त पूछा॥ ४२ ॥

महामुने! मेरे पूछनेपर उसने जो अपने जन्म-कर्म निवेदन किये थे, उन्हें बताता हूँ। सुनिये—उसका नाम काली था और वह निषादकुलकी कन्या थी॥ ४३ ॥

विद्वन्! उसके पिताका नाम दाम्भिक (या दाविक) था। वह उसीकी पुत्री थी और विन्ध्यपर्वतपर निवास करती थी। सदा दूसरोंका धन चुराना और चुगली खाना ही उसका काम था॥ ४४ ॥

एक दिन उसने अपने पतिकी हत्या कर डाली, इसीलिये भाई-बन्धुओंने उसे घरसे निकाल दिया। ब्रह्मन्! इस तरह परित्यक्ता काली उस दुर्गम एवं निर्जन वनमें मेरे पास आयी थी॥ ४५ ॥