श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 91, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसने अपनी सारी करतूतें मुझे इसी रूपमें बतायी थीं। मुने! तब वसिष्ठजीके उस पवित्र आश्रमके निकट मैं और काली—दोनों पति-पत्नीका सम्बन्ध स्वीकार करके रहने और मांसाहारसे ही जीवन-निर्वाह करने लगे॥ ४६ १/२ ॥
एक दिन हम दोनों जीविकाके निमित्त कुछ उद्यम करनेके लिये वहाँ वसिष्ठजीके आश्रमपर गये। महात्मन्! वहाँ देवर्षियोंका समाज जुटा हुआ था। वही देखकर हमलोग उधर गये थे। वहाँ माघमासमें प्रतिदिन ब्राह्मणलोग रामायणका पाठ करते दिखायी देते थे॥ ४७-४८ ॥
उस समय हमलोग निराहार थे और पुरुषार्थ करनेमें समर्थ होकर भी भूख-प्याससे कष्ट पा रहे थे। अतः बिना इच्छाके ही वसिष्ठजीके आश्रमपर चले गये थे। फिर लगातार नौ दिनोंतक भक्तिपूर्वक रामायणकी कथा सुननेके लिये हम दोनों वहाँ जाते रहे। मुने! उसी समय हम दोनोंकी मृत्यु हो गयी॥ ४९-५० ॥
हमारे उस कर्मसे भगवान् मधुसूदनका मन प्रसन्न हो गया था, अतः उन्होंने हमें ले आनेके लिये दूत भेजे॥ ५१ ॥
वे दूत हम दोनोंको विमानमें बिठाकर भगवान्के परम पद (उत्तम धाम) में ले गये। हम दोनों देवाधिदेव चक्रपाणिके निकट जा पहुँचे*॥ ५२ ॥
वहाँ हमने जितने समयतक बड़े-बड़े भोग भोगे थे, वह बता रहे हैं। सुनिये—कोटि सहस्र और कोटि शत युगोंतक श्रीरामधाममें निवास करके हमलोग ब्रह्मलोकमें आये। वहाँ भी उतने ही समयतक रहकर हम इन्द्रलोकमें आ गये॥ ५३-५४ ॥
मुनिश्रेष्ठ! इन्द्रलोकमें भी उतने ही कालतक परम उत्तम भोग भोगनेके पश्चात् हम क्रमशः इस पृथ्वीपर आये हैं॥ ५५ ॥
यहाँ भी रामायणके प्रसादसे हमें अतुल सम्पत्ति प्राप्त हुई है। मुने! अनिच्छासे रामायणका श्रवण करनेपर भी हमें ऐसा फल प्राप्त हुआ है॥ ५६ ॥
धर्मात्मन्! यदि नौ दिनोंतक भक्ति-भावसे रामायणकी अमृतमयी कथा सुनी जाय तो वह जन्म, जरा और मृत्युका नाश करनेवाली होती है॥ ५७ ॥
विप्रवर! सुनिये, विवश होकर भी जो कर्म किया जाता है, वह रामायणके प्रसादसे परम महान् फल प्रदान करता है॥ ५८ ॥