भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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**नारदजी कहते हैं—**यह सब सुनकर मुनीश्वर विभाण्डक राजा सुमतिका अभिनन्दन करके अपने तपोवनको चले गये॥ ५९ ॥

विप्रवरो! अतः आपलोग देवाधिदेव चक्रपाणि भगवान् श्रीहरिकी कथा सुनिये। रामायणकथा कामधेनुके समान अभीष्ट फल देनेवाली बतायी गयी है॥ ६० ॥

माघमासके शुक्ल पक्षमें प्रयत्नपूर्वक रामायणकी नवाह्नकथा सुननी चाहिये। वह सम्पूर्ण धर्मोंका फल प्रदान करनेवाली है॥ ६१ ॥

यह पवित्र आख्यान समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। जो इसे बाँचता अथवा सुनता है, वह भगवान् श्रीरामका भक्त होता है॥ ६२ ॥

इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके उत्तरखण्डमें नारदसनत्कुमारसंवादके अन्तर्गत रामायणमाहात्म्यके प्रसंगमें माघमासमें रामायणकथाश्रवणके फलका वर्णन नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥ ३॥


^* यहाँ जिस परम पदसे लौटनेका वर्णन है, वह ब्रह्मलोकसे भिन्न कोई उत्तम लोक था, जहाँ भगवान् मधुसूदनके सांनिध्य तथा श्रीरामके दर्शन-सुखका अनुभव होता था, इसे साक्षात् वैकुण्ठ या साकेत नहीं मानना चाहिये; क्योंकि वहाँसे पुनरावृत्ति नहीं होती। अनिच्छासे कथा-श्रवण करनेके कारण उन्हें अपुनरावर्ती लोक नहीं मिला था।