भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 94

ऐसा निश्चय करके वह चोरीपर लट्टू रहनेवाला व्याध श्रीरामके मन्दिरमें गया। वहाँ उसने शान्त, तत्त्वार्थवेत्ता और भगवान्‌की आराधनामें तत्पर उत्तङ्क मुनिका दर्शन किया, जो तपस्याकी निधि थे। वे अकेले ही रहते थे। उनके हृदयमें सबके प्रति दया भरी थी। वे सब ओरसे निःस्पृह थे। उनके मनमें केवल भगवान्‌के ध्यानका ही लोभ बना रहता था॥ १२-१३ ॥

उन्हें वहाँ उपस्थित देख व्याधने उनको चोरीमें विघ्न डालनेवाला समझा। तदनन्तर जब आधी रात हुई, तब वह देवतासम्बन्धी द्रव्यसमूह लेकर चला॥ १४ ॥

उस मदोन्मत्त व्याधने उत्तङ्क मुनिकी छातीको अपने एक पैरसे दबाकर हाथसे उनका गला पकड़ लिया और तलवार उठाकर उन्हें मार डालनेका उपक्रम किया॥ १५ ॥

उत्तङ्कने देखा व्याध मुझे मार डालना चाहता है तो वे उससे इस प्रकार बोले॥ १५ १/२ ॥

उत्तङ्कने कहा—ओ भले मानुष! तुम व्यर्थ ही मुझे मारना चाहते हो। मैं तो सर्वथा निरपराध हूँ॥ १६ ॥

लुब्धक! बताओ तो सही, मैंने तुम्हारा क्या अपराध किया है? संसारमें लोग अपराधीकी ही प्रयत्नपूर्वक हिंसा करते हैं। सौम्य! सज्जन निरपराधकी व्यर्थ हिंसा नहीं करते हैं॥ १७ १/२ ॥

शान्तचित्त साधु पुरुष अपने विरोधी तथा मूर्ख मनुष्योंमें भी सद्गुणोंकी स्थिति देखकर उनके साथ विरोध नहीं रखते हैं॥ १८ १/२ ॥

जो मनुष्य बारम्बार दूसरोंकी गाली सुनकर भी क्षमाशील बना रहता है, वह उत्तम कहलाता है। उसे भगवान् विष्णुका अत्यन्त प्रियजन बताया गया है॥

दूसरोंके हित-साधनमें लगे रहनेवाले साधुजन किसीके द्वारा अपने विनाशका समय उपस्थित होनेपर भी उसके साथ वैर नहीं करते। चन्दनका वृक्ष अपनेको काटनेपर भी कुठारकी धारको सुवासित ही करता है॥

अहो! विधाता बड़ा बलवान् है। वह लोगोंको नाना प्रकारसे कष्ट देता रहता है। जो सब प्रकारके संगसे रहित है, उसे भी दुरात्मा मनुष्य सताया करते हैं॥

अहो! दुष्टजन इस संसारमें बहुत-से जीवोंको बिना किसी अपराधके ही पीड़ा देते हैं। मल्लाह मछलियोंके, चुगलखोर सज्जनोंके और व्याध मृगोंके इस जगतमें अकारण वैरी होते हैं॥ २३ ॥