श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअहो! माया बड़ी प्रबल है। यह सम्पूर्ण जगत्को मोहमें डाल देती है तथा स्त्री, पुत्र और मित्र आदिके द्वारा सबको सब प्रकारके दुःखोंसे संयुक्त कर देती है॥
मनुष्य पराये धनका अपहरण करके जो अपनी स्त्री आदिका पोषण करता है, वह किस कामका; क्योंकि अन्तमें उन सबको छोड़कर वह अकेला ही परलोककी राह लेता है॥ २५ ॥
‘मेरी माता, मेरे पिता, मेरी पत्नी, मेरे पुत्र तथा मेरा यह घरबार’—इस प्रकार ममता व्यर्थ ही प्राणियोंको कष्ट देती रहती है॥ २६ ॥
मनुष्य जबतक कमाकर धन देता है, तभीतक लोग उसके भाई-बन्धु बने रहते हैं और उसके कमाये हुए धनको सारे बन्धु-बान्धव सदा भोगते रहते हैं; किंतु मूर्ख मनुष्य अपने किये हुए पापके फलरूप दुःखको अकेला ही भोगता है॥ २७ १/२ ॥
उत्तङ्क मुनि जब इस प्रकार कह रहे थे, तब उनकी बातोंपर विचार करके कलिक नामक व्याध भयसे व्याकुल हो उठा और हाथ जोड़कर बारम्बार कहने लगा—‘प्रभो! मेरे अपराधको क्षमा कीजिये’॥
उन महात्माके संगके प्रभावसे तथा भगवान्का सांनिध्य मिल जानेसे उस लुब्धकके सारे पाप नष्ट हो गये तथा उसके मनमें निश्चय ही बड़ा पश्चात्ताप होने लगा॥
वह बोला—‘विप्रवर! मैंने जीवनमें बहुत-से बड़े-बड़े पाप किये हैं; किंतु वे सब आपके दर्शनमात्रसे नष्ट हो गये॥ ३० १/२ ॥
‘प्रभो! मेरी बुद्धि सदा पापमें ही डूबी रहती थी। मैंने निरन्तर बड़े-बड़े पापोंका ही आचरण किया है। उनसे मेरा उद्धार किस प्रकार होगा? मैं किसकी शरणमें जाऊँ?’॥ ३१ १/२ ॥
‘पूर्वजन्मके किये हुए पापोंके फलसे मुझे व्याध होना पड़ा है, यहाँ भी मैंने पापोंके ही जाल बटोरे हैं। ये पाप करके मैं किस गतिको प्राप्त होऊँगा?’॥ ३२ १/२ ॥
महामना कलिककी यह बात सुनकर ब्रह्मर्षि उत्तङ्क इस प्रकार बोले॥ ३३ १/२ ॥
उत्तङ्कने कहा—महामते व्याध! तुम धन्य हो, धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि बड़ी निर्मल और उज्ज्वल है; क्योंकि तुम संसारसम्बन्धी दुःखोंके नाशका उपाय जानना चाहते हो॥ ३४ १/२ ॥
चैत्रमासके शुक्लपक्षमें तुम्हें भक्तिभावसे आदरपूर्वक रामायणकी नवाह कथा सुननी चाहिये। उसके श्रवणमात्रसे मनुष्य समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है॥ ३५-३६ ॥