शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८६ )
जब कहा मैंने—तड़पता है बहुत अब दिल मेरा ।
हँसके फुरमाया—तड़पता होगा सौदाई तो हो ॥—हाली ।
जब मैंने कहा कि, मेरा दिल आपके लिए बहुत तड़पता है, नब उन्होंने हँसकर जवाब दिया—“तड़पता होगा, तुम पागल ही तो हो ।” ( बेरहमीकी हद हो गई ) ।
कहा उन्होंने शवे गमका माजरा सुनकर ।
तेरे मिज़ाजकी शोर्नी थी, इज़्तराब न था ॥—दाग ।
उन्होंने जुदाईकी रातकी बातें सुनकर जवाब दिया—तुमने क्या दुःख उठाया, मनकी ऐसी चञ्चलता ठीक नहीं । मतलब यह कि, तुमने जो दुःख उठाया, वह तुम्हारी चञ्चलताकी वजहसे उठाया, विरहके सन्तापसे नहीं ।
भागये हैं आपके अन्दाज़ो नाज़ ।
कीजिये अगमाज़ जितना चाहिये ॥
आपके नाज़ो अन्दाज़ मुझे पसन्द आ गये हैं । अब आपको अवतार है, चाहे जितने नज़रें कीजिये—चाहे जितना सताइये और तरसाइये ।
तेरे सहरे नज़रसे हुआ य जुनूँ ।
मेरे दिलकी तो इसमें खता ही न थी ॥
तेरे कूचेंमें आके बैठ गया ।
बजुज इसके कुछ और दवा ही न थी ॥—अकबर ।