शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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ये संगदिल—पत्थर-हृदय ! तुम्हें हमने अपने सुख बढ़ाने-वाली समझी । हमारी अकलपर पत्थर पड़े—हमने क्या का क्या समझ लिया ।
फुलूतमें तेरी, तारे नफ़स सीनेमें मेरे ।
कौटा सा खटकता है, निकल जाय तो अच्छा ॥—जौक ।
तेरी जुदाईमें मेरे प्राण मेरी छातीमें कौटिकी तरह खटकते हैं, किसी तरह यह काँटा निकल जाय तो अच्छा ।
मैं जाता जहाँसे हूँ, तू आता नहीं याँ तक ।
काफ़िर ! तुम्हें कुछ खोफ़ खुदाका नहीं आता ॥—जौक ।
मैं तो तेरी मुहब्बतमें इस दुनियासे ही जाता हूँ, पर तुम्हसे यहताँक भी आया नहीं जाता ! काफ़िर ! क्या तू परमेश्वरसे भी नहीं डरती ?
बाकी न रहा खून भी, अब मेरे ज़िगरमें ।
अफ़सोस ! हुआ चाहती है तर्क गिज़ा भी ॥
तेरे लिये रोते-रोते मेरे ज़िगरमें अब खून भी नहीं रहा है । अफ़सोस ! अब खाना-पीना भी छुटना चाहता है ।
खूने दिल पीनेको, और लड़ते ज़िगर खानेको ।
यह गिज़ा मिलती है जानी ! तेरे दीवानेको ॥
प्यारी ! तेरे पागलको पीनेके लिये खून और खानेके लिए ज़िगरका टुकड़ा मिलता है, अब उसका यही आहार है ।