भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 107

( ८८ )

ये संगदिल—पत्थर-हृदय ! तुम्हें हमने अपने सुख बढ़ाने-वाली समझी । हमारी अकलपर पत्थर पड़े—हमने क्या का क्या समझ लिया ।

फुलूतमें तेरी, तारे नफ़स सीनेमें मेरे ।

कौटा सा खटकता है, निकल जाय तो अच्छा ॥—जौक ।

तेरी जुदाईमें मेरे प्राण मेरी छातीमें कौटिकी तरह खटकते हैं, किसी तरह यह काँटा निकल जाय तो अच्छा ।

मैं जाता जहाँसे हूँ, तू आता नहीं याँ तक ।

काफ़िर ! तुम्हें कुछ खोफ़ खुदाका नहीं आता ॥—जौक ।

मैं तो तेरी मुहब्बतमें इस दुनियासे ही जाता हूँ, पर तुम्हसे यहताँक भी आया नहीं जाता ! काफ़िर ! क्या तू परमेश्वरसे भी नहीं डरती ?

बाकी न रहा खून भी, अब मेरे ज़िगरमें ।

अफ़सोस ! हुआ चाहती है तर्क गिज़ा भी ॥

तेरे लिये रोते-रोते मेरे ज़िगरमें अब खून भी नहीं रहा है । अफ़सोस ! अब खाना-पीना भी छुटना चाहता है ।

खूने दिल पीनेको, और लड़ते ज़िगर खानेको ।

यह गिज़ा मिलती है जानी ! तेरे दीवानेको ॥

प्यारी ! तेरे पागलको पीनेके लिये खून और खानेके लिए ज़िगरका टुकड़ा मिलता है, अब उसका यही आहार है ।