भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( ८७ )

दिल ठण्डा हो गया—मुर्खा गया । इस हथियारका भरोसा था, पर अब मालूम हो गया कि, यह हथियार भी बेकाम साबित हुआ । ( माथूका जब संगदिली अक्षत्यार कर लेती है, तब नहीं पसीजती, रहम नहीं करती ) ।

मुझको हर शब हिज्जकी, होने लगी जूँ, रोज हश्र ।

मुझसे यह किस दिनेके बदले, आस्माँ लेने लगा ॥—जौक ।

जुदाईकी हरेक रात मेरे लिये प्रलयके दिन सी जान पड़ती है, काटेसे नहीं कटती ! आस्मान ! तू मुझसे किस दिनेके बदले ले रहा है ?

अजल आई न शबे हिज्जमें, और तूने फलक !

वे-अजल हमको, तमन्नाए अजलमें मारा ॥—जौक ।

ऐ आस्मान ! जुदाईकी रातमें मौत न आई, पर तूने मौतकी चाहमें हमें बे-मौतही रातभर मारा ।

मौत हीसे कुछ इलाजे, ददें फुर्कत हो तो हो ।

गुसलु मैथत ही हमारा, गुसले सेहत हो तो हो ॥—जौक ।

जुदाईकी बीमारीका इलाज मौतसे ही हो, तो हो सकता है । मौतका खान ही हमारी आरोग्यताका खान हो सकता है ।

अब आशिक अपनी माथूकासे मुखतिब होकर कहता है :—

तुम्हें ऐ संगदिल ! आरामे जाने मुश्ताला.समझे ।

पड़े पत्थर समझ पर अपनी, हम समझे तो क्या समझे ॥