भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( ८६ )

मुझे वह पर्दानशीं, सामने कब आने दे ।

जो जिक्र करने न दे अपने रोबरू मेरा ॥ जौक ।

वह पर्दानशीन माशूका मुझे कब सामने आने देती है ? वह तो मेरा जिक्र भी अपने सामने नहीं होने देती ।

कुछ तर्जें सितम भी है, कुछ अन्दरुजि वफा भी ।

खुलता नहीं हाल, उनकी तबीयतका जरा भी ॥—अकबर ।

उसमें कुछ जुल्मके भी ढंग हैं और कुछ वफादारीके भी । उसके दिलमें क्या है, यह जरा भी समझमें नहीं आता ।

याँ लब पै लाख-लाख सखुन इज़्ज़ाब में ।

याँ एक खामुशी तेरी, सबके जवाब में ॥

में तो उनके सामने हज़ारों बातें बनाता हूँ ; पर वे मेरी सभी बातोंके जवाबमें एक चुप्पी साथे रहती हैं—मेरी बातोंका जवाब ही नहीं देतीं ।

इससे तो और आग वह बेदद हो गया ।

अब आह आतशीसि भी, दिल सर्ड हो गया ॥—जौक ।

मैंने समझा था कि मेरे रोने-घोनेसे उसका पत्थर-हृदय कुछ तो पसीजैगा—उसे मुझपर तरस आयेगा ; पर हुआ इसका उल्टा । मेरी गरम आहोने उसे और भी गरम कर दिया—भड़का दिया । मुझे अपनी गरम आहोका बड़ा भरोसा था, उम्मीद थी, कि इनसे ज़रूर कामयाबी होगी, पर अब इस तरफसे भी मेरा

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