भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( ६१ )

माशूका शिकायतके तौरपर कहती है :—

नित नया ज़ायका चखनेका लपका है उनको ।

दरबदर माँकते फिरनेसे उन्हें थार नहीं ॥

दाव-ये इश्को मुहब्बत पै न जाना उनके ।

उनमें गुफ्तार ही गुफ्तार है, किरदार नहीं ॥

आजकल हरेक आदमी आशिक बना हुआ है । जहाँ किसी खूबसूरत औरत को देखा कि, इश्क़का दम भरने लगे । ऐसे लोग नित नया स्वाद चखनेको दरदर मारे-मारे फिरते हैं ।

ऐसे लोगोंकी प्रेम-प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करना अक़्समन्दी नहीं । वे जिसे देखते हैं उसीसे मुहब्बत करते फिरते हैं । उनमें बातोंके सिवा तत्त्व नहीं ।

पाठक ! आपने ऊपरकी कविताओंसे समझा होगा, कि बेवारे आशिक़ कैसी-कैसी खुशामदें करते हैं, जान देते हैं ; पर बेरहम नाज़नियाँ उन्हें किस तरह मोहित करतीं और फिर किस तरह तरसतीं, धमकातीं और उनकी मुहब्बतको झूठी बताकर उन्हें निराशा और दुखी करती हैं । इस जगह इतनी कविताओंके देनेकी ज़रूरत न थी, पर हमने इतनी कविताएँ इस ग़ज़से दी हैं, कि पाठक माशूकाओंकी आदतोंसे वाकिफ़ होनेके साथ-ही-साथ उर्दू शायरीका भी मज़ा लूटे ।

द्वैराग्य पद्य ।

सब तरहसे दुःख देनेवाली, सन्निपातज्वर की तरह मोह,