शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६२ )
प्रलाप, प्रमाद, मूर्च्छा और निर्लज्जता प्रभृति पैदा करने वाली कामिनियोंको जो सुखबल्लरी समझते हैं, वे यदि बुद्धिमान हैं तो मूर्ख कौन हैं ? वे ठीक अपथ्य सेवन करके रोग मोल लेने वालों की तरह हैं । हाँ, जो लोक-परलोक की परवा नहीं करते, जो इस जन्मके बाद और जन्म नहीं मानते, जो इस जगत्में आकर इस जगत्के सुख भोगना ही अपने जीवनका लक्ष्य समझते हैं, उनके लिये ये सुन्दरियाँ, अनेक कष्ट देने वाली होने पर भी, परमानन्ददायिनी हैं ; पर जिन्हें पुनर्जन्ममें विश्वास है, जिन्हें बारम्बारका जन्म-मरण बुरा मालूम होता है, जिन्हें सच्चे और नित्य सुख की दृकार है, उन्हें इन मोहिनी—पर काली नागिनोंसे बचना चाहिये ; क्योंकि इनके काटे हुए पुरुषको बारम्बार संसार-बन्धनमें बँधना होता है । संसार-बन्धनमें बँधने या बारम्बार मरने और मर्कड़े पेटमें नौ महीने रहकर जन्म लेनेमें ऐसे घोर कष्ट है, जिन्हें हम लिखकर बता नहीं सकते । आपको इस जन्म-मरणके भयका चित्र स्वामी शंकराचार्यजी के नीचेके श्लोकसे मालूम होगा :—
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।
इह संसारे भयदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुगरे !
फिर जन्म लेते हैं, फिर मरते हैं और फिर मर्कड़े पेटमें सोते हैं ! यह असाह संसार बड़ा भयकारी है । हे मुनारि ! कृपा कर मुझे इससे पार कीजिये ।