भारतकोश
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शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

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प्रलाप, प्रमाद, मूर्च्छा और निर्लज्जता प्रभृति पैदा करने वाली कामिनियोंको जो सुखबल्लरी समझते हैं, वे यदि बुद्धिमान हैं तो मूर्ख कौन हैं ? वे ठीक अपथ्य सेवन करके रोग मोल लेने वालों की तरह हैं । हाँ, जो लोक-परलोक की परवा नहीं करते, जो इस जन्मके बाद और जन्म नहीं मानते, जो इस जगत्में आकर इस जगत्के सुख भोगना ही अपने जीवनका लक्ष्य समझते हैं, उनके लिये ये सुन्दरियाँ, अनेक कष्ट देने वाली होने पर भी, परमानन्ददायिनी हैं ; पर जिन्हें पुनर्जन्ममें विश्वास है, जिन्हें बारम्बारका जन्म-मरण बुरा मालूम होता है, जिन्हें सच्चे और नित्य सुख की दृकार है, उन्हें इन मोहिनी—पर काली नागिनोंसे बचना चाहिये ; क्योंकि इनके काटे हुए पुरुषको बारम्बार संसार-बन्धनमें बँधना होता है । संसार-बन्धनमें बँधने या बारम्बार मरने और मर्कड़े पेटमें नौ महीने रहकर जन्म लेनेमें ऐसे घोर कष्ट है, जिन्हें हम लिखकर बता नहीं सकते । आपको इस जन्म-मरणके भयका चित्र स्वामी शंकराचार्यजी के नीचेके श्लोकसे मालूम होगा :—

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।

इह संसारे भयदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुगरे !

फिर जन्म लेते हैं, फिर मरते हैं और फिर मर्कड़े पेटमें सोते हैं ! यह असाह संसार बड़ा भयकारी है । हे मुनारि ! कृपा कर मुझे इससे पार कीजिये ।

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शेर ।

हैं फिर-फिर लोग मरते जन्म लेते ।

हैं फिर-फिर रहममें आ कष्ट देते ।

विनय करते हैं, सुख अब नाथ ! लीजे ।

तनासुखके न फिर-फिर साज सजरे ।

विमुख गोविन्द भज गोविन्द भजरे ॥

बहुत क्या कहें, स्त्री ही संसार-बन्धन की जड़ है। बेटे-बेटी, नाती पोते, दोह्ति दोह्ति वगैरः उसके पत्ते और शाखें हैं। अगर आप लोग इस जड़को ही त्याग दें, तो संसार-बन्धन या वार-बार जनमने और मरनेके घोरातिघोर कष्टोंसे बच सकते हैं।

दुनियादारोंको सलाह ।

यह सलाह हमने अधिकारियोंको दी है, अनाधिकारियोंको नहीं। दुनियादारोंको जानना चाहिये कि, स्त्रियोंसे सुख और दुःख दोनों ही होते हैं। यदि उनकी वजहसे पुरुष-को अनन्त दुःख उठाने पड़ते हैं; तो स्वर्गीय सुख भी उनसे ही मिलते हैं। फ्रैंचोमें एक कहावत है—“Women, money and wine have their blessing and their bane” स्त्री, सम्पत्ति और सुरामें सुख और दुःख दोनों ही हैं। एमिएल महाशय कहते हैं—“Woman is at once the delight and terror of man” स्त्री, पुरुषके लिए हर्ष और भय दोनोंहीका हेतु है। संसारमें वैराग्यको छोड़कर और ऐसी कोई

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बात नहीं है जिसमें सुख-ही-सुख हो। अगर सभी पुरुष स्त्रियोंसे नातां न जोड़ें, शादी-विवाह न करें तो ईश्वर की स्मृति ही लोप हो जाय, संसार ही न रहे ; इसलिये जिनसे पूर्ण वैराग्य न लिया जाय उन्हें घर-गृहस्थीमें रहना चाहिये, पर जलमें कमल की तरह। गृहस्थके सारे काम करो, पर मनको उसी तरह ईश्वरमें रखो, जिस तरह पनिहारी सिर पर घड़े लिये हुए अपने यारसे भी बातें करती है और हँसती है, पर मनको घड़ेमें ही रखती है। अगर ऐसा न करे, तो घड़े गिर कर फूट जायँ।

सोरठा ।

मोह प्रलाप प्रमाद, ज्ञाननाश निर्लज्जता ।

शोक कलेश विपाद, कहा न कर हिय घुस त्रिया ? ॥२१॥

सार—स्त्रियाँ जिसके हृदयमें प्रवेश कर जाती हैं, उसकी अवस्था सन्निपात-रोगीकी सी हो जाती है। ये अपने चाहनेवालेको मजनूँ की तरह ख़ुब्तुलहवास करके, क्या-क्या कष्ट नहीं देतीं ? उसे जीतेजी मदारीके बन्दरकी तरह नचातीं और मरने पर नरकमें पहुँचाती हैं।

21. What could not the beautiful-eyed woman do, by piercing the frail heart of a man, that women who fascinate him, intoxicate him, vexes him, takes him to task, gives him the

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pleasures of enjoying her and puts him to sorrow by her separation.

—*—

विश्रम्य विश्रम्य वन्दुभाणां छायासु तन्वी-विचचार काचित् ।

स्तनोत्तरीयेण करोद्द्युतेन निवारयन्ती शशिनो मृगवान् ॥२२॥

वनके वृक्षोंकी छायामें बारम्बार विश्राम करती हुई, वह विरहिणी स्त्री, अपने कोमल शरीर की रक्षाके लिए, अपना आँचल हाथमें उठा, उससे चन्द्रमाकी किरणोंको रोकती हुई गूंम रही है ॥२२॥

खुलासा—वह विरहिणी स्त्री इतनी नाजूक है, कि सूरज तो सूरज, चन्द्रमा की शीतल किरणों की रोशनीको भी बर्दाश्त नहीं कर सकती । चन्द्र-किरणोंसे उसके नाजूक और सुकुमार शरीरको कष्ट न हो, इसीलिये उसने अपना आँचल मुँहके सामने कर रक्खा है । नज़ाकतके मारे ही वह ज़रा चलती है और फिर वृक्षों की छायामें सुस्ताने लगती है । इस नज़ाकत का क्या ठिकाना है ?

कवियों की महिमा अपार है । वे लोग जिस-किसीकी तारीफ करने लगते हैं, उसे चरम को पहुँचा देते हैं । महाकवि मीर किसी नाज़नीकी नज़ाकत पर क्या खूब कहते हैं :—

खपेटे जो चोटी पै फूलोंके हार ।

नज़ाकतसे दोहरी कमर होगई ॥

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वह नाज़नी इतनी नाज़ुक थी, कि उसने अपनी चोटी पर जो फूलों के हार लपेटे, तो मारे बोकके उसकी कमर बल खा गई।

महाराजा भर्तृहरि की विरहिणी नायिका तो चन्द्रमाकी शीतल किरणों को नहीं सह सकती और महाकवि मीरकी नायिका की कमर चोटी पर फूलों के हार लपेटनेसे ही दोहरी हो गई। गुजबकी शायरी है। नज़ाकत और सुकुमारता की हद्द हो गयी !!

पण्डितेन्द्र जगन्नाथको तो अपनी नायिकाकी नज़ाकतकी तारीफ करनेके लिये कोई उपमाही नहीं मिलती। आप कहते हैं :—

नितरां पशुषा सरोजमाला न मृणालिनि विचार पेशलानि ।

यदि कोमलता तवांगकानामय का नाम कथापि पल्लवानाम् ॥

हे भामिनी ! हम तेरे शरीरकी कोमलताकी तुलना किस पदार्थसे करें, जब कि सरोज-माल भी तेरी कोमलताके आगे कठोर मालूम होती है ? कमलनालकी कोमलताका तो विचार करना ही किज़ूह है। जब कमलके कोमल पुष्पोंकी यह हालत है, तब उसके पत्तोंका नाम लेनेसे क्या लाभ ? वे बेचारे तेरी कोमलता की क्या बराबरी करेंगे ? तेरी कोमलता की उपमा का मिलना ही असम्भव है।

महाकवि नज़ीरकी सुकुमार नायिकाके पैरोंके तलवोंकी नमी का भी हाल सुन लीजिये :—

वह कोफे पा हमने सुहलाये हैं, नाज़ुक नर्म-नर्म।

क्या जताती है तू अपनी नमी, ऐ मखमल ! हमें ॥

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भूङ्गराशतक

वन के वृक्षों की छाया में विश्राम करतो हुई विरहिणी स्त्री, अपने नाजुक शरीर की रक्षा के लिये, अपना आँचल हाथ में उठा, उससे चन्द्रमा की किरणों को रोकती हुई वन में जा रही है। यह स्त्री पर-पुरुषता अभिसारिका-नायिका है। अपने यार से मिलने जा रही है। यह इतनी नाजुक है, कि चन्द्रमा की शीतल किरणों को भी बरदास्त नहीं कर सकती।

[ पृष्ठ ५८ ]

Popular Press—Calcutta.

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हमने प्यारीके कोमल-कोमल तलवे सुहलाये हैं ; मखमल ! तू अपनी कोमलता हमें क्या दिखाती है ? प्यारीके तलवों की नर्मके सामने तेरी नर्मों कोई चीज़ नहीं ।

हमारे मनचले पाठक, इतनेसे ही सन्तोष करले । कवियोंने खियोंकी तारीफ़में ज़मीन-आस्मानके कुलावे मिला दिये हैं ।

दोहा ।

नारि विरहनी तरु तरे, बैठौ शशि सों भाग ।

चन्द्रकिरण कों चौर सों, दूर करत दुखपाग ॥२२॥

सार—इस श्लोकमें वर्णित स्त्री अभिसारिका* और परले सिरोंकी नाज़ुक-बदन है । उसके प्रत्येक कामसे उसकी नजाकत भलकती है ।

22. A woman frequently resting under the shade of trees in the forest, roams about, raising with her hands the cloth covering her breast to prevent the rays of moon.

❖ नियत समय पर अपने थार से मिलनेको जा रही हो, वह “अभि- सारिका” कहलाती है । A woman who is going to meet her lover by appointment. (इस श्लोकमें वर्णित स्त्री नियत समय पर अपने थारसे मिलने जा रही है ; पर है ऐसी सकुमार कि, चन्द्रमाकी किरणोंकी शीतलताको भी बढ़ायात कर नहीं सकती ; इसीसे मुँहके सामने अपना आंचल कर रक्खा है और ज़रा-ज़रा दूर चलनेसे थक कर, छायामें विश्राम लेती और फिर चलती है ।

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अर्शने दर्शनमात्रकामा दृष्ट्वा परिषंगरसैकलोला ।

आलिंगितायां पुनरायताच्यामाशास्महे विग्रहयोरभेदम् ॥२॥

जब तक हम विशाल-नयनी कामिनीको नहीं देखते, तब तक तो उसे देखने ही की इच्छा रहती है, दर्शन नसीब हो जाने पर, उसे आलिंगन करनेकी लालसा बलवती होती है। जब आलिङ्गन भी हो जाता है, तब तो यह इच्छा होती है कि, यह कामिनी हमारे शरीर से अलग ही न हो—हमारा दोनोंका शरीर एक हो जाय।

खुलासा—प्रायः सभी जानते हैं कि, एक बार किसी सुन्दरी को देख लेने या उसकी रूपमाधुरीकी चर्चा सुन लेने पर, तबीयत यही चाहती है कि, उसके दर्शन-भर हो जाय। जब सौभाग्य से उसके दर्शन हो जाते हैं; तब तृष्णा और भी बढ़ती है। दर्शन के बाद उसे शरीरसे चिपटानेकी लालसा होती है। ज्योंही हम उसे अपने शरीरसे चिपटाते हैं, कि फिर उससे अलग होनेको मन नहीं चाहता—दिल कहता है कि, परमात्मा हमारे और इसके शरीरको कभी अलग न करे। हम दोनोंका शरीर एक हो जाय।

कामी पुरुष और धन-तृष्णाके फेरमें पड़े हुए मनुष्यकी हालत एकसी होती है। जिस तरह कामी पुरुष पहले किसी सारङ्ग-लोचनाके दर्शन-भर चाहता है, दर्शन हो जाने पर आलिङ्गनके लिए लालायित होता है और आलिङ्गन हो जाने पर चाहता है कि, यह चन्द्रानना मेरे शरीरसे अलग ही न हो; उसी तरह

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तृष्णाके फेरमें पड़ा हुआ पहले सौ, फिर हजार, फिर लाख, फिर करोड़ और फिर भूमण्डलका राज्य चाहता है। सारी पृथ्वीका राज्य मिल जाने पर त्रिलोकीका आधिपत्य चाहता है। जब उसे त्रिभुवनका राज्य भी मिल जाता है, तब वह चाहता है कि, मैं इसे सर्वा-सर्वदा भोगता रहूँ—यह मेरे हाथसे कभी न जाय।

जो मनुष्य धनको सदा तुच्छ मिट्टीके ढलेके समान समझते हैं, उसके नजदीक नहीं जाते, कभी एक पैसा संग्रह नहीं करते, उन्हें धनकी तृष्णा नहीं होती। उन्हींकी तरह जो पुण्य मोहिनी कामिनियोंसे दूर रहते हैं, उनके नजदीक नहीं जाते, उन्हें देखना भी नहीं चाहते, वे उन जादूगरनियोंके फन्देमें नहीं फँसते। ऐसा कौन पुण्य है, जो किसी चन्द्रानना कामिनीको देख कर अपने मनको कानूनोंमें रख सके? जब तक कोई खूबसूरत बला नज़र नहीं आती, तभी तक खैर है—तभी तक धर्म-ईमान और खराई-सखाई प्रभुतिकी रक्षा है। उस्ताद जौकने बहुत ठीक कहा है:—

शुक्र ! परदे ही मैं उस बुतको हथाने रखा ।

वर्ना ईमान गया ही था, खुदाने रखा ॥

शर्मके मारे वह घरसे बाहर न निकली—पड़ेंमें ही रही आई, यह अच्छा ही हुआ। अगर वह घर छोड़कर बाहर आती और हम उसे देख लेते, तो फिर हमारे ईमानका रहना कठिन हो था।

खूबसूरती वह शै है, कि उसके आगे ईमान और धर्म कुछ

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नहीं रहते। कहा है:—Beauty is a witch, against whose charms faith melteth into blood. Much Ado, ii. 1.

अर्थात् खूबसूरती वह जादूगरनी है, जिसके जादूसे ईमानका खून हो जाता है। महात्मा गोथेने भी एक जगह कहा है—Beauty is everywhere a right welcome guest.

अर्थात् खूबसूरती हर कहीं लायक और दिलावेज्ज मिहमान है, अथवा सौन्दर्य्यका एक योग्य अतिथिकी तरह सर्वत्र स्वागत होता है, सौन्दर्य्यका सर्वत्र बोलबाला है—खूबसूरतीकी खातिर कहाँ नहीं होती? खूबसूरतीका नशा शराबसे भी ज्व-दंस्त है। शराबके तो पीनेसे नशा आता और आदमी मतबाला होता है; पर सुन्दरी मृगनयनीसे आँखें मिलते ही नशा चढ़ आता है। परमात्माने इनकी आँखोंमें एक अजोब नशा भर दिया है। महाकवि अकबरने बहुत ही ठीक कहा है:—

करते वो निगाहोंसे, अगर बादाफ़रोशी । होता न गुजर, जानिबे-मैखाना किसी का ॥

अगर वे अपनी मद्दपूर्ण आँखोंसे मदिरा बेचतीं यानी अपनी मदभरी चितवन लोगों पर डालतीं, तो कोई भी शराबकी दूकान की तरफ न जाता। शराबका काम उनको आँखोंसे ही हो जाता—उनसे बार नज़र होते ही नशा चढ़ आता।

हमारे एक हिन्दू कविने भी ऐसी ही बात कही है और बड़ी ही मज़ेदारीसे कही है:—

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श्री हलाहल मद भरे, श्वेतश्याम रतनार ।

जियत मरत मुक्ति-मुक्ति परत, जेहि चित्तवत इकबार ॥

उसकी सफेद श्याम और रतनारी आँखोंमें अमृत है, हलाहल विष है और मद है ; तभी तो वह जिसकी तरफ एक बार देख लेती है,—वह जीता है, मरता है और झुक-झुक पड़ता है ।

प्रेमरसन महोदय कहते हैं—Beauty is the pilot of the young soul. अर्थात् सौन्दर्य नवयुवकोंका पथ-प्रदर्शक है । जहाज़का मार्गी जिस तरह जहाज़को राह दिखाता है, जहाँ चाहता है वहाँ ले जाता है ; उसी तरह खूबसूरती जवानोंको जहाँ चाहती है ले जाती है । सारोंश यह कि, उठती जवानीके पढ़े सुन्दरियोंसे आँख मिलाते ही उनके गुलाम हो जाते हैं । स्त्रियाँ जो चाहती हैं वही करते हैं, उनकी दिखाई राह पर चलते हैं और उनकी मरजीके खिलाफ कोई काम कर नहीं सकते । नौजवान दुनियादार इनके जालमें फँसते हैं, इसमें तो कोई अचम्भेकी बात ही नहीं । वे पहुँचे हुए चूड़ तपस्वी जो हवा और पानी मात्र पर जिन्दगी बसर करते हैं, हर क्षण जगदीशका नाम रटा करते हैं, ख्वाबमें भी कामिनीका दर्शन नहीं करते और दर्शन करने पर भी उनके दाममें न फँसनेका पक्के-से-पक्का इरादा रखते हैं, उनको देखते ही, उनसे चार आँखें होते ही, उनके गुलाम हो जाते और होगये हैं । विश्वामित्र, पराशर और श्रृंगी ऋषिको इन शब्दोंमें न सही—दूसरे शब्दोंमें अपनी-अपनी माशूकाओंसे .क्रीब-क्रीब यही कहना पड़ा होगा :—

( १०२ )

खुदाके होते बुतोंको पूँछूँ, नहीं था सुतलक गुमान ऐसा । मगर तुम्हें देखकर तो क्ल्हाह, आगया मुझको ध्यान ऐसा ॥—श्रवकर ।

संभावना नहीं थी कि, मैं ईश्वरके होते हुए, तुम जैसी सौन्दर्य की प्रतिमाओं की पूजा करूँ ; पर आज तुम्हें देखकर और ही बात हो गई । परमात्मा की कसम खाकर कहता हूँ, कि अब तुम्हारी खूबसूरती पर लट्ठू होकर मैं ईश्वरको भूल जाऊँगा ।

फिर आपलोगोंने अपनी पिछली और उस समयकी हालतका मुकाबला करते हुए कहा होगा :—

जिस दिलको कैद हरित-ये दुनियासे नंग था ।

वह दिल असीर हलक-ये जुल्फे बुतों है अब ॥

एक वह दिन था कि हमारा दिल संसारके जज्जालोंमें पड़ना शर्मकी बात समझता था और एक आज है कि, माशूकाकी जुल्फोंमें बेतरह उलझा पड़ा है । कैसा परिवर्तन है !

ऐ जौक ! आज सामने उस चरम मस्तके ।

बातिल सब अपने दाव-ये दानिशवरी हुए ॥

उसकी मद्दमस्त मनोहर आँखके सामने आज हमारी योग्यता, बुद्धिमत्ता और प्रतिष्ठाका अन्त हो गया ।

( १०३ )

वैराग्य पञ्च ।

विषयोंका यही हाल है । ज्यों-ज्यों हमारी इच्छायें पूरी होती हैं, त्यों-त्यों वे और बढ़ती हैं ; इसलिये विषय-विषये बचनेके लिये, मनुष्यको विषयोंका ध्यान ही न करना चाहिये । असल में, विषयोंका ध्यान ही सारे अनर्थोंका मूल है । अगर मन द्वारा विषयोंका ध्यान ही न किया जाय, तो विषयोंमें प्रीति ही क्यों हो ? जब विषयोंसे प्रीति ही न होगी, तब कोई भी अनर्थ हो न सकेगा ।

स्त्रीको एकवार देख लेने पर, उसे बार-बार देखनेको मन चाहता है । वस, यहींसे सिर पर भून सवार हो जाता है । इसलिये जिनको जन्म-मरणके जज्जालसे बचना हो, जिनको दुर्लभ मोक्ष-पद लाभ करना हो, जिनको अक्षय सुख भोगना हो, वे ऐसे निर्जन वनमें जाकर रहें, जहाँ इन ललित ललनाओंके दर्शन ही न हों । जब ये मीहिनी दीर्घेगी ही नहीं, तो मन कैसे चलेगा ? न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसरी ।

छप्पय ।

धिन देखे मन होय, वाय कैसे कर देखै । देखे तैं चित होय, अंग आलिगन सेवै ॥ आलिगन तैं होत, याहि तनमय कर राखै । जैसै जल अरु दूध, एक रस त्यों अभिलाषै ॥ मिल रहे तऊ मिलवौँ चहत, कहा नाम या विरह को ? । वरन्यो न जात अदुसुत चरित, प्रेम-पाठकी गिरह को ॥२३॥

( १०४ )

सार—नवयुवती कामिनीके बशलमें आने पर, उसे कोई भी कामो पुरुष, ब्रह्मभरको भी छाड़ना नहीं चाहता अथवा एकवार स्त्रियोंका चन्द्रानन देख लेने पर, उनके फन्देमें न फँसना असम्भव है ।

23. So long as I do not see her I desire to see her, but having seen her, I long to embrace her and after having embraced her I desire that there may not be separation from her, whose eyes become extended at the time of embraced union.

—*—

मालती शिरसि जूम्भणोन्मुखी चन्दनं वपुषि कुंकुमान्वितम् ।

वत्तसि प्रियतमा मनोहरा स्वर्ग एव परिशिष्ट आगतः ॥२४॥

अधखिले मालतीके सुगन्धित फूलोंकी माला गलेमें पड़ी हो, केशर-मिला चन्दन शरीरमें लगा हो और हृदयहारिणी प्राणप्यारी छातीसे चिपटी हो, तो समझ लो कि, स्वर्गका शेष सुख यहीं मिल गया ।

खुलासा—गलेमें खिलने ही वाले मालतीके फूलोंकी माला पहनना, केशर और चन्दन शरीरमें लगाना और मनोहर प्यारी को छातीसे लगाना—स्वर्ग-सुख है । जिन्हें इस पाप-ताप-पूर्ण संसारमें यह सुख प्राप्त हो, उनके लिये यहीं स्वर्ग हैं । स्वर्गमें

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इससे अधिक और कुछ नहीं है। पण्डितराज जगन्नाथ महोदय कहते हैं :—

विधाय सा मद्भदनातुङ्गलं कपोजमूलं हृदये शयाना ।

तन्वी तदानीमतुलां बलारेः साम्राज्यलक्ष्मीमथरीचकार ॥

मेरी छातीपर सोनेवाली नाज़ुनीने जब अपनी चिबुक—ठोड़ी मेरे मुँह पर, जहाँ वह रक्खी जानी चाहिये थी वहाँ रक्खी ; तब मेहनद्दकी अतुल राजलक्ष्मी का सुख भी मुझे तुच्छ प्रतीत होने लगा ।

किसीने पू्व और सब कहा है :—

संसारे तु धरासारं धरायां नगरं मतम् ।

आगारं नगरे तव सारं सारंगलोचना ॥

सारंगलोचनायाश्च सुरतं सारसुच्यते ।

नातः परतरं सारं विद्यते सुखदं दृणाम् ॥

सारभूतन्तु सर्वेषां परमानन्द सोदरम् ।

सुरतं ये न सेवन्ते तेषां जन्मैव निष्फलम् ॥

संसारमें पृथ्वी सार है, पृथ्वी पर नगर सार है। नगरमें घर सार है और घरमें भुगनयनी कामिनी सार है। भुगनयनीमें सुरत * सम्भोग सार है। इससे अधिक सुखदायी और सार

❁ सुरत=खो-गुल्फका सम्भोग, रतिकर्म, मैथुन। इसे अँगरेज़ोंमें copulation या coition कह सकते हैं ; क्योंकि हरतके समय खो-गुल्फ एक हो जाते या एक दूसरेमें मिल जाते हैं।

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वस्तु पुरुषोंके लिए और नहीं है। जो पुरुष-बोलेमें आकर समस्त पदार्थोंके सार, परमानन्दके सगे भाई सुरतको सेवन नहीं करते—सम्भोग-सुख नहीं भोगते, उनका इस दुनियामें जन्म लेना ही बेकार है।

निश्चय ही संसारियोंके लिये ऐश-आराम के ऐसे सामानोंका मयस्सर होना,—स्वर्ग-सुख उपभोग करना है। इस बातकी सचाईको वे ही समझ सकते हैं, जो चतुर और कामशास्त्र-विशारद रसिक हैं। नपुंसकोंको इस आनन्द का हाल क्या मालूम ?

वैराग्य पद्म ।

अपनी-अपनी रुचि अलग-अलग है। सबकी इच्छायें एक दूसरेसे भिन्न हैं। एक जिस चीज़को अच्छी समझता है, दूसरा उसीको बुरी समझता है। जो चीज़ जिसको प्यारी न हो, वह कौसी ही सुन्दर और रसीली क्यों न हो, उसे अच्छी नहीं लगती।

अंगरेज़ीमें भी एक कहावत है—“Fair is not fair, but that which pleaseth.” सुन्दर सुन्दर नहीं है; किन्तु वही सुन्दर है, जो अपने मनको भावे।

चन्द्रमा सबको प्यारा लगता है, पर कमलिनियों और विरही जनोंको अप्रिय लगता है। संसारका यही हाल है। रसिक पुरुष मालतीके फूलोंकी माला पहनने, केशर चन्दनसे अङ्गारण करने और प्राणप्यायियोंको डातीसे लगानेको ही स्वर्ग-सुख समझते हैं। और कोई-कोई रसिक ऐसे भी हैं, जो इस सुखके आगे

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स्वर्गकी भी सारी सस्यदाको तुच्छ समझते हैं। एक ओर ऐसे लोग हैं; तो दूसरी ओर कुछ ऐसे भी हैं, जो इन सभी सुखोंको मिथ्या, अनित्य और परिणाममें शोक, मोह, रोग और नरकका दाता समझते हैं। जिन नवयौवनाओंको कामी अवला समझते हैं, उन्हें वे सबला समझते हैं। जिन्हें कामी कोमलाड़ी कहते हैं, उन्हें वे वज्राड़ी कहते हैं। जिन्हें कामी निर्मला और रूपमाधुरी की खान समझते हैं, उन्हें वे कुमला और घुणित गन्दी चीज़ोंका पिटारा समझते हैं। कामी पुरुष स्त्रियोंको ही ध्यान करना पसन्द करते हैं, पर वे ब्रह्मका ध्यान करना ही अच्छा समझते हैं। उनका कहना है, कामियोंके भोग-बिलासमें जो सुख है, वह अनित्य और परिणाममें घोर दुःखोंके देनेवाला है; पर ब्रह्म-विचार में लीन होनेका सुख नित्य और परिणाममें कल्याण करनेवाला है। तात्पर्य यह है, कि कामियोंको ही सुन्दरियोंमें स्वर्ग-सुख प्रतीत होता है; विरामियोंको तो इनमें नरक-दुख—किन्तु ब्रह्म-विचारमें वर्णनातीत परम सुख मालूम होता है।

दोहा।

कैसर सों अँगिया सनी, बनी नयन की नोक।

मिली प्राणध्यारी मनों, घर आयो सुरलोक ॥२४॥

सार—खबरू और कमसिन नाजनी को छातीसे लगानेमें जो मजा है, वहिश्तमें उससे बढ़कर मजा नहीं।

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24. If there be on the head a garland of Malti flowers which are about to blossom, if sandal mixed with saffron is besmeared on the body and the beloved beautiful lady is embraced on the bosom, then I take this as the pleasure of heaven.

—❧—

प्राङ्मायेति मनागमानितगुणां जाताभिलाषं ततः सवीरं तदनु शलथोद्यतमवृषत्यस्तथैवं पुनः ॥ प्रेमाद्रैःपृथ्वाणीयनिर्भरहः क्रीडाप्रगल्भंतो निःशंकांगविकर्षणादिकसुखं रम्यं कुलस्वीरतम् ॥२५॥

पहले-पहल तो “न न” कहती* है। इसके बाद थोड़ी-थोड़ी अभिलाषा करती है। इसके पीछे लजाती हुई अंगोंको ढीला कर देती है और फिर अवीर हो, प्रेमके रसमें शराबेर हो जाती है। इसके भी पीछे; एकान्त क्रीडाकी इच्छा करती है और भोग-विलासमें तरह-तरहकी चातुरी दिखाती हुई, निःशंक होकर मर्दन चुम्बनादिसे असाधारण सुख देती है। ये सब मनोहर गुण कुलबालाओंमें ही होते हैं; इसलिये कुलकामिनियोंके साथ ही रमण करना चाहिये ॥२५॥

❧ जीन पाल महोदय कहते हैं—Women are shy of nothing so much as the little word “Yes” at least they say it only after they have said “No,” स्त्रियोंको “हाँ” कहनेमें जितनी लज्जा मालूम होती है, उतनी और किसी दूसरी बातमें नहीं। वे कम-से-कम “नहीं” कह चुकने पर ही “हाँ” कहते हैं।

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इस श्लोकमें, महाराजा भर्तृहरिने, नबोढ़ा—नई व्याही हुई बहसे लेकर, प्रौढ़ा—पूर्ण युवती और अंधेड़ अवस्था तककी अपनी खीके हाव-भाव और भोग-विलासके सुखोंका वर्णन बड़ी ही खूबीसे किया है। उनके सुरतका चित्र ज्योंका त्यों खींच दिया है।

नई व्याही हुई वह पुरुषके साथ समागम होते समय भयके मारे “न न” कहती है, अथवा अधिक सामर्थ्य न होनेके कारण, “अव नहीं, अव नहीं” कहती है। बुद्धिमान् कामियोंको, इन “न न” या “नहीं नहीं”के शब्दोंमें विचित्र प्रकारका रस और मज़ा मालूम होता है। उस मज़ेकी बात भुक्तभोगी, जानते हुए भी, ज़बान या कलमसे लिखकर बता नहीं सकते। क्योंकि उस मज़ेका हाल दिल जानता है ; पर दिलके ज़बान नहीं हैं और ज़बानके दिल नहीं। रसिक-शिरोगमणि पण्डितराज जगन्नाथ कहते हैं :—

श्रुतिशतमपि भूयः शीलितं भारतं वा । विरचयति तथा नो हंत सन्तापशान्तिम् ॥ अपि सपदि यथायं कैलिविश्रान्तकान्ता । वदनकमल वल्यत्कांति सान्द्रोनकारः ॥

काम-क्रीडासे थकी हुई खीके मुखकमलसे निकला हुआ रसमय “नकार” “नहीं-नहीं” कहना, जिस तरह पुरुषके सन्ताप को शीघ्र ही हर लेता है ; उस तरह सैकड़ों श्रुतियों और महा-भारत प्रभृति पुराणोंका अध्ययन और मनन भी नहीं कर सकता।