शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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स्वर्गकी भी सारी सस्यदाको तुच्छ समझते हैं। एक ओर ऐसे लोग हैं; तो दूसरी ओर कुछ ऐसे भी हैं, जो इन सभी सुखोंको मिथ्या, अनित्य और परिणाममें शोक, मोह, रोग और नरकका दाता समझते हैं। जिन नवयौवनाओंको कामी अवला समझते हैं, उन्हें वे सबला समझते हैं। जिन्हें कामी कोमलाड़ी कहते हैं, उन्हें वे वज्राड़ी कहते हैं। जिन्हें कामी निर्मला और रूपमाधुरी की खान समझते हैं, उन्हें वे कुमला और घुणित गन्दी चीज़ोंका पिटारा समझते हैं। कामी पुरुष स्त्रियोंको ही ध्यान करना पसन्द करते हैं, पर वे ब्रह्मका ध्यान करना ही अच्छा समझते हैं। उनका कहना है, कामियोंके भोग-बिलासमें जो सुख है, वह अनित्य और परिणाममें घोर दुःखोंके देनेवाला है; पर ब्रह्म-विचार में लीन होनेका सुख नित्य और परिणाममें कल्याण करनेवाला है। तात्पर्य यह है, कि कामियोंको ही सुन्दरियोंमें स्वर्ग-सुख प्रतीत होता है; विरामियोंको तो इनमें नरक-दुख—किन्तु ब्रह्म-विचारमें वर्णनातीत परम सुख मालूम होता है।
दोहा।
कैसर सों अँगिया सनी, बनी नयन की नोक।
मिली प्राणध्यारी मनों, घर आयो सुरलोक ॥२४॥
सार—खबरू और कमसिन नाजनी को छातीसे लगानेमें जो मजा है, वहिश्तमें उससे बढ़कर मजा नहीं।