भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १०६ )

वस्तु पुरुषोंके लिए और नहीं है। जो पुरुष-बोलेमें आकर समस्त पदार्थोंके सार, परमानन्दके सगे भाई सुरतको सेवन नहीं करते—सम्भोग-सुख नहीं भोगते, उनका इस दुनियामें जन्म लेना ही बेकार है।

निश्चय ही संसारियोंके लिये ऐश-आराम के ऐसे सामानोंका मयस्सर होना,—स्वर्ग-सुख उपभोग करना है। इस बातकी सचाईको वे ही समझ सकते हैं, जो चतुर और कामशास्त्र-विशारद रसिक हैं। नपुंसकोंको इस आनन्द का हाल क्या मालूम ?

वैराग्य पद्म ।

अपनी-अपनी रुचि अलग-अलग है। सबकी इच्छायें एक दूसरेसे भिन्न हैं। एक जिस चीज़को अच्छी समझता है, दूसरा उसीको बुरी समझता है। जो चीज़ जिसको प्यारी न हो, वह कौसी ही सुन्दर और रसीली क्यों न हो, उसे अच्छी नहीं लगती।

अंगरेज़ीमें भी एक कहावत है—“Fair is not fair, but that which pleaseth.” सुन्दर सुन्दर नहीं है; किन्तु वही सुन्दर है, जो अपने मनको भावे।

चन्द्रमा सबको प्यारा लगता है, पर कमलिनियों और विरही जनोंको अप्रिय लगता है। संसारका यही हाल है। रसिक पुरुष मालतीके फूलोंकी माला पहनने, केशर चन्दनसे अङ्गारण करने और प्राणप्यायियोंको डातीसे लगानेको ही स्वर्ग-सुख समझते हैं। और कोई-कोई रसिक ऐसे भी हैं, जो इस सुखके आगे