भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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इससे अधिक और कुछ नहीं है। पण्डितराज जगन्नाथ महोदय कहते हैं :—

विधाय सा मद्भदनातुङ्गलं कपोजमूलं हृदये शयाना ।

तन्वी तदानीमतुलां बलारेः साम्राज्यलक्ष्मीमथरीचकार ॥

मेरी छातीपर सोनेवाली नाज़ुनीने जब अपनी चिबुक—ठोड़ी मेरे मुँह पर, जहाँ वह रक्खी जानी चाहिये थी वहाँ रक्खी ; तब मेहनद्दकी अतुल राजलक्ष्मी का सुख भी मुझे तुच्छ प्रतीत होने लगा ।

किसीने पू्व और सब कहा है :—

संसारे तु धरासारं धरायां नगरं मतम् ।

आगारं नगरे तव सारं सारंगलोचना ॥

सारंगलोचनायाश्च सुरतं सारसुच्यते ।

नातः परतरं सारं विद्यते सुखदं दृणाम् ॥

सारभूतन्तु सर्वेषां परमानन्द सोदरम् ।

सुरतं ये न सेवन्ते तेषां जन्मैव निष्फलम् ॥

संसारमें पृथ्वी सार है, पृथ्वी पर नगर सार है। नगरमें घर सार है और घरमें भुगनयनी कामिनी सार है। भुगनयनीमें सुरत * सम्भोग सार है। इससे अधिक सुखदायी और सार

❁ सुरत=खो-गुल्फका सम्भोग, रतिकर्म, मैथुन। इसे अँगरेज़ोंमें copulation या coition कह सकते हैं ; क्योंकि हरतके समय खो-गुल्फ एक हो जाते या एक दूसरेमें मिल जाते हैं।