शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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सार—नवयुवती कामिनीके बशलमें आने पर, उसे कोई भी कामो पुरुष, ब्रह्मभरको भी छाड़ना नहीं चाहता अथवा एकवार स्त्रियोंका चन्द्रानन देख लेने पर, उनके फन्देमें न फँसना असम्भव है ।
23. So long as I do not see her I desire to see her, but having seen her, I long to embrace her and after having embraced her I desire that there may not be separation from her, whose eyes become extended at the time of embraced union.
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मालती शिरसि जूम्भणोन्मुखी चन्दनं वपुषि कुंकुमान्वितम् ।
वत्तसि प्रियतमा मनोहरा स्वर्ग एव परिशिष्ट आगतः ॥२४॥
अधखिले मालतीके सुगन्धित फूलोंकी माला गलेमें पड़ी हो, केशर-मिला चन्दन शरीरमें लगा हो और हृदयहारिणी प्राणप्यारी छातीसे चिपटी हो, तो समझ लो कि, स्वर्गका शेष सुख यहीं मिल गया ।
खुलासा—गलेमें खिलने ही वाले मालतीके फूलोंकी माला पहनना, केशर और चन्दन शरीरमें लगाना और मनोहर प्यारी को छातीसे लगाना—स्वर्ग-सुख है । जिन्हें इस पाप-ताप-पूर्ण संसारमें यह सुख प्राप्त हो, उनके लिये यहीं स्वर्ग हैं । स्वर्गमें