भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १०३ )

वैराग्य पञ्च ।

विषयोंका यही हाल है । ज्यों-ज्यों हमारी इच्छायें पूरी होती हैं, त्यों-त्यों वे और बढ़ती हैं ; इसलिये विषय-विषये बचनेके लिये, मनुष्यको विषयोंका ध्यान ही न करना चाहिये । असल में, विषयोंका ध्यान ही सारे अनर्थोंका मूल है । अगर मन द्वारा विषयोंका ध्यान ही न किया जाय, तो विषयोंमें प्रीति ही क्यों हो ? जब विषयोंसे प्रीति ही न होगी, तब कोई भी अनर्थ हो न सकेगा ।

स्त्रीको एकवार देख लेने पर, उसे बार-बार देखनेको मन चाहता है । वस, यहींसे सिर पर भून सवार हो जाता है । इसलिये जिनको जन्म-मरणके जज्जालसे बचना हो, जिनको दुर्लभ मोक्ष-पद लाभ करना हो, जिनको अक्षय सुख भोगना हो, वे ऐसे निर्जन वनमें जाकर रहें, जहाँ इन ललित ललनाओंके दर्शन ही न हों । जब ये मीहिनी दीर्घेगी ही नहीं, तो मन कैसे चलेगा ? न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसरी ।

छप्पय ।

धिन देखे मन होय, वाय कैसे कर देखै । देखे तैं चित होय, अंग आलिगन सेवै ॥ आलिगन तैं होत, याहि तनमय कर राखै । जैसै जल अरु दूध, एक रस त्यों अभिलाषै ॥ मिल रहे तऊ मिलवौँ चहत, कहा नाम या विरह को ? । वरन्यो न जात अदुसुत चरित, प्रेम-पाठकी गिरह को ॥२३॥