शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( १०२ )
खुदाके होते बुतोंको पूँछूँ, नहीं था सुतलक गुमान ऐसा । मगर तुम्हें देखकर तो क्ल्हाह, आगया मुझको ध्यान ऐसा ॥—श्रवकर ।
संभावना नहीं थी कि, मैं ईश्वरके होते हुए, तुम जैसी सौन्दर्य की प्रतिमाओं की पूजा करूँ ; पर आज तुम्हें देखकर और ही बात हो गई । परमात्मा की कसम खाकर कहता हूँ, कि अब तुम्हारी खूबसूरती पर लट्ठू होकर मैं ईश्वरको भूल जाऊँगा ।
फिर आपलोगोंने अपनी पिछली और उस समयकी हालतका मुकाबला करते हुए कहा होगा :—
जिस दिलको कैद हरित-ये दुनियासे नंग था ।
वह दिल असीर हलक-ये जुल्फे बुतों है अब ॥
एक वह दिन था कि हमारा दिल संसारके जज्जालोंमें पड़ना शर्मकी बात समझता था और एक आज है कि, माशूकाकी जुल्फोंमें बेतरह उलझा पड़ा है । कैसा परिवर्तन है !
ऐ जौक ! आज सामने उस चरम मस्तके ।
बातिल सब अपने दाव-ये दानिशवरी हुए ॥
उसकी मद्दमस्त मनोहर आँखके सामने आज हमारी योग्यता, बुद्धिमत्ता और प्रतिष्ठाका अन्त हो गया ।