भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १०२ )

खुदाके होते बुतोंको पूँछूँ, नहीं था सुतलक गुमान ऐसा । मगर तुम्हें देखकर तो क्ल्हाह, आगया मुझको ध्यान ऐसा ॥—श्रवकर ।

संभावना नहीं थी कि, मैं ईश्वरके होते हुए, तुम जैसी सौन्दर्य की प्रतिमाओं की पूजा करूँ ; पर आज तुम्हें देखकर और ही बात हो गई । परमात्मा की कसम खाकर कहता हूँ, कि अब तुम्हारी खूबसूरती पर लट्ठू होकर मैं ईश्वरको भूल जाऊँगा ।

फिर आपलोगोंने अपनी पिछली और उस समयकी हालतका मुकाबला करते हुए कहा होगा :—

जिस दिलको कैद हरित-ये दुनियासे नंग था ।

वह दिल असीर हलक-ये जुल्फे बुतों है अब ॥

एक वह दिन था कि हमारा दिल संसारके जज्जालोंमें पड़ना शर्मकी बात समझता था और एक आज है कि, माशूकाकी जुल्फोंमें बेतरह उलझा पड़ा है । कैसा परिवर्तन है !

ऐ जौक ! आज सामने उस चरम मस्तके ।

बातिल सब अपने दाव-ये दानिशवरी हुए ॥

उसकी मद्दमस्त मनोहर आँखके सामने आज हमारी योग्यता, बुद्धिमत्ता और प्रतिष्ठाका अन्त हो गया ।