भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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शेर ।

हैं फिर-फिर लोग मरते जन्म लेते ।

हैं फिर-फिर रहममें आ कष्ट देते ।

विनय करते हैं, सुख अब नाथ ! लीजे ।

तनासुखके न फिर-फिर साज सजरे ।

विमुख गोविन्द भज गोविन्द भजरे ॥

बहुत क्या कहें, स्त्री ही संसार-बन्धन की जड़ है। बेटे-बेटी, नाती पोते, दोह्ति दोह्ति वगैरः उसके पत्ते और शाखें हैं। अगर आप लोग इस जड़को ही त्याग दें, तो संसार-बन्धन या वार-बार जनमने और मरनेके घोरातिघोर कष्टोंसे बच सकते हैं।

दुनियादारोंको सलाह ।

यह सलाह हमने अधिकारियोंको दी है, अनाधिकारियोंको नहीं। दुनियादारोंको जानना चाहिये कि, स्त्रियोंसे सुख और दुःख दोनों ही होते हैं। यदि उनकी वजहसे पुरुष-को अनन्त दुःख उठाने पड़ते हैं; तो स्वर्गीय सुख भी उनसे ही मिलते हैं। फ्रैंचोमें एक कहावत है—“Women, money and wine have their blessing and their bane” स्त्री, सम्पत्ति और सुरामें सुख और दुःख दोनों ही हैं। एमिएल महाशय कहते हैं—“Woman is at once the delight and terror of man” स्त्री, पुरुषके लिए हर्ष और भय दोनोंहीका हेतु है। संसारमें वैराग्यको छोड़कर और ऐसी कोई

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