भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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बात नहीं है जिसमें सुख-ही-सुख हो। अगर सभी पुरुष स्त्रियोंसे नातां न जोड़ें, शादी-विवाह न करें तो ईश्वर की स्मृति ही लोप हो जाय, संसार ही न रहे ; इसलिये जिनसे पूर्ण वैराग्य न लिया जाय उन्हें घर-गृहस्थीमें रहना चाहिये, पर जलमें कमल की तरह। गृहस्थके सारे काम करो, पर मनको उसी तरह ईश्वरमें रखो, जिस तरह पनिहारी सिर पर घड़े लिये हुए अपने यारसे भी बातें करती है और हँसती है, पर मनको घड़ेमें ही रखती है। अगर ऐसा न करे, तो घड़े गिर कर फूट जायँ।

सोरठा ।

मोह प्रलाप प्रमाद, ज्ञाननाश निर्लज्जता ।

शोक कलेश विपाद, कहा न कर हिय घुस त्रिया ? ॥२१॥

सार—स्त्रियाँ जिसके हृदयमें प्रवेश कर जाती हैं, उसकी अवस्था सन्निपात-रोगीकी सी हो जाती है। ये अपने चाहनेवालेको मजनूँ की तरह ख़ुब्तुलहवास करके, क्या-क्या कष्ट नहीं देतीं ? उसे जीतेजी मदारीके बन्दरकी तरह नचातीं और मरने पर नरकमें पहुँचाती हैं।

21. What could not the beautiful-eyed woman do, by piercing the frail heart of a man, that women who fascinate him, intoxicate him, vexes him, takes him to task, gives him the