भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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pleasures of enjoying her and puts him to sorrow by her separation.

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विश्रम्य विश्रम्य वन्दुभाणां छायासु तन्वी-विचचार काचित् ।

स्तनोत्तरीयेण करोद्द्युतेन निवारयन्ती शशिनो मृगवान् ॥२२॥

वनके वृक्षोंकी छायामें बारम्बार विश्राम करती हुई, वह विरहिणी स्त्री, अपने कोमल शरीर की रक्षाके लिए, अपना आँचल हाथमें उठा, उससे चन्द्रमाकी किरणोंको रोकती हुई गूंम रही है ॥२२॥

खुलासा—वह विरहिणी स्त्री इतनी नाजूक है, कि सूरज तो सूरज, चन्द्रमा की शीतल किरणों की रोशनीको भी बर्दाश्त नहीं कर सकती । चन्द्र-किरणोंसे उसके नाजूक और सुकुमार शरीरको कष्ट न हो, इसीलिये उसने अपना आँचल मुँहके सामने कर रक्खा है । नज़ाकतके मारे ही वह ज़रा चलती है और फिर वृक्षों की छायामें सुस्ताने लगती है । इस नज़ाकत का क्या ठिकाना है ?

कवियों की महिमा अपार है । वे लोग जिस-किसीकी तारीफ करने लगते हैं, उसे चरम को पहुँचा देते हैं । महाकवि मीर किसी नाज़नीकी नज़ाकत पर क्या खूब कहते हैं :—

खपेटे जो चोटी पै फूलोंके हार ।

नज़ाकतसे दोहरी कमर होगई ॥