शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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वह नाज़नी इतनी नाज़ुक थी, कि उसने अपनी चोटी पर जो फूलों के हार लपेटे, तो मारे बोकके उसकी कमर बल खा गई।
महाराजा भर्तृहरि की विरहिणी नायिका तो चन्द्रमाकी शीतल किरणों को नहीं सह सकती और महाकवि मीरकी नायिका की कमर चोटी पर फूलों के हार लपेटनेसे ही दोहरी हो गई। गुजबकी शायरी है। नज़ाकत और सुकुमारता की हद्द हो गयी !!
पण्डितेन्द्र जगन्नाथको तो अपनी नायिकाकी नज़ाकतकी तारीफ करनेके लिये कोई उपमाही नहीं मिलती। आप कहते हैं :—
नितरां पशुषा सरोजमाला न मृणालिनि विचार पेशलानि ।
यदि कोमलता तवांगकानामय का नाम कथापि पल्लवानाम् ॥
हे भामिनी ! हम तेरे शरीरकी कोमलताकी तुलना किस पदार्थसे करें, जब कि सरोज-माल भी तेरी कोमलताके आगे कठोर मालूम होती है ? कमलनालकी कोमलताका तो विचार करना ही किज़ूह है। जब कमलके कोमल पुष्पोंकी यह हालत है, तब उसके पत्तोंका नाम लेनेसे क्या लाभ ? वे बेचारे तेरी कोमलता की क्या बराबरी करेंगे ? तेरी कोमलता की उपमा का मिलना ही असम्भव है।
महाकवि नज़ीरकी सुकुमार नायिकाके पैरोंके तलवोंकी नमी का भी हाल सुन लीजिये :—
वह कोफे पा हमने सुहलाये हैं, नाज़ुक नर्म-नर्म।
क्या जताती है तू अपनी नमी, ऐ मखमल ! हमें ॥