भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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अर्शने दर्शनमात्रकामा दृष्ट्वा परिषंगरसैकलोला ।

आलिंगितायां पुनरायताच्यामाशास्महे विग्रहयोरभेदम् ॥२॥

जब तक हम विशाल-नयनी कामिनीको नहीं देखते, तब तक तो उसे देखने ही की इच्छा रहती है, दर्शन नसीब हो जाने पर, उसे आलिंगन करनेकी लालसा बलवती होती है। जब आलिङ्गन भी हो जाता है, तब तो यह इच्छा होती है कि, यह कामिनी हमारे शरीर से अलग ही न हो—हमारा दोनोंका शरीर एक हो जाय।

खुलासा—प्रायः सभी जानते हैं कि, एक बार किसी सुन्दरी को देख लेने या उसकी रूपमाधुरीकी चर्चा सुन लेने पर, तबीयत यही चाहती है कि, उसके दर्शन-भर हो जाय। जब सौभाग्य से उसके दर्शन हो जाते हैं; तब तृष्णा और भी बढ़ती है। दर्शन के बाद उसे शरीरसे चिपटानेकी लालसा होती है। ज्योंही हम उसे अपने शरीरसे चिपटाते हैं, कि फिर उससे अलग होनेको मन नहीं चाहता—दिल कहता है कि, परमात्मा हमारे और इसके शरीरको कभी अलग न करे। हम दोनोंका शरीर एक हो जाय।

कामी पुरुष और धन-तृष्णाके फेरमें पड़े हुए मनुष्यकी हालत एकसी होती है। जिस तरह कामी पुरुष पहले किसी सारङ्ग-लोचनाके दर्शन-भर चाहता है, दर्शन हो जाने पर आलिङ्गनके लिए लालायित होता है और आलिङ्गन हो जाने पर चाहता है कि, यह चन्द्रानना मेरे शरीरसे अलग ही न हो; उसी तरह