भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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तृष्णाके फेरमें पड़ा हुआ पहले सौ, फिर हजार, फिर लाख, फिर करोड़ और फिर भूमण्डलका राज्य चाहता है। सारी पृथ्वीका राज्य मिल जाने पर त्रिलोकीका आधिपत्य चाहता है। जब उसे त्रिभुवनका राज्य भी मिल जाता है, तब वह चाहता है कि, मैं इसे सर्वा-सर्वदा भोगता रहूँ—यह मेरे हाथसे कभी न जाय।

जो मनुष्य धनको सदा तुच्छ मिट्टीके ढलेके समान समझते हैं, उसके नजदीक नहीं जाते, कभी एक पैसा संग्रह नहीं करते, उन्हें धनकी तृष्णा नहीं होती। उन्हींकी तरह जो पुण्य मोहिनी कामिनियोंसे दूर रहते हैं, उनके नजदीक नहीं जाते, उन्हें देखना भी नहीं चाहते, वे उन जादूगरनियोंके फन्देमें नहीं फँसते। ऐसा कौन पुण्य है, जो किसी चन्द्रानना कामिनीको देख कर अपने मनको कानूनोंमें रख सके? जब तक कोई खूबसूरत बला नज़र नहीं आती, तभी तक खैर है—तभी तक धर्म-ईमान और खराई-सखाई प्रभुतिकी रक्षा है। उस्ताद जौकने बहुत ठीक कहा है:—

शुक्र ! परदे ही मैं उस बुतको हथाने रखा ।

वर्ना ईमान गया ही था, खुदाने रखा ॥

शर्मके मारे वह घरसे बाहर न निकली—पड़ेंमें ही रही आई, यह अच्छा ही हुआ। अगर वह घर छोड़कर बाहर आती और हम उसे देख लेते, तो फिर हमारे ईमानका रहना कठिन हो था।

खूबसूरती वह शै है, कि उसके आगे ईमान और धर्म कुछ