भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( २७ )

हमने प्यारीके कोमल-कोमल तलवे सुहलाये हैं ; मखमल ! तू अपनी कोमलता हमें क्या दिखाती है ? प्यारीके तलवों की नर्मके सामने तेरी नर्मों कोई चीज़ नहीं ।

हमारे मनचले पाठक, इतनेसे ही सन्तोष करले । कवियोंने खियोंकी तारीफ़में ज़मीन-आस्मानके कुलावे मिला दिये हैं ।

दोहा ।

नारि विरहनी तरु तरे, बैठौ शशि सों भाग ।

चन्द्रकिरण कों चौर सों, दूर करत दुखपाग ॥२२॥

सार—इस श्लोकमें वर्णित स्त्री अभिसारिका* और परले सिरोंकी नाज़ुक-बदन है । उसके प्रत्येक कामसे उसकी नजाकत भलकती है ।

22. A woman frequently resting under the shade of trees in the forest, roams about, raising with her hands the cloth covering her breast to prevent the rays of moon.

❖ नियत समय पर अपने थार से मिलनेको जा रही हो, वह “अभि- सारिका” कहलाती है । A woman who is going to meet her lover by appointment. (इस श्लोकमें वर्णित स्त्री नियत समय पर अपने थारसे मिलने जा रही है ; पर है ऐसी सकुमार कि, चन्द्रमाकी किरणोंकी शीतलताको भी बढ़ायात कर नहीं सकती ; इसीसे मुँहके सामने अपना आंचल कर रक्खा है और ज़रा-ज़रा दूर चलनेसे थक कर, छायामें विश्राम लेती और फिर चलती है ।