भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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इस श्लोकमें, महाराजा भर्तृहरिने, नबोढ़ा—नई व्याही हुई बहसे लेकर, प्रौढ़ा—पूर्ण युवती और अंधेड़ अवस्था तककी अपनी खीके हाव-भाव और भोग-विलासके सुखोंका वर्णन बड़ी ही खूबीसे किया है। उनके सुरतका चित्र ज्योंका त्यों खींच दिया है।

नई व्याही हुई वह पुरुषके साथ समागम होते समय भयके मारे “न न” कहती है, अथवा अधिक सामर्थ्य न होनेके कारण, “अव नहीं, अव नहीं” कहती है। बुद्धिमान् कामियोंको, इन “न न” या “नहीं नहीं”के शब्दोंमें विचित्र प्रकारका रस और मज़ा मालूम होता है। उस मज़ेकी बात भुक्तभोगी, जानते हुए भी, ज़बान या कलमसे लिखकर बता नहीं सकते। क्योंकि उस मज़ेका हाल दिल जानता है ; पर दिलके ज़बान नहीं हैं और ज़बानके दिल नहीं। रसिक-शिरोगमणि पण्डितराज जगन्नाथ कहते हैं :—

श्रुतिशतमपि भूयः शीलितं भारतं वा । विरचयति तथा नो हंत सन्तापशान्तिम् ॥ अपि सपदि यथायं कैलिविश्रान्तकान्ता । वदनकमल वल्यत्कांति सान्द्रोनकारः ॥

काम-क्रीडासे थकी हुई खीके मुखकमलसे निकला हुआ रसमय “नकार” “नहीं-नहीं” कहना, जिस तरह पुरुषके सन्ताप को शीघ्र ही हर लेता है ; उस तरह सैकड़ों श्रुतियों और महा-भारत प्रभृति पुराणोंका अध्ययन और मनन भी नहीं कर सकता।