भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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दूसरी अवस्थामें “न न” कहते-कहते, फिर कामिनीकी स्वयं इच्छा होती है। इच्छा होने पर वह लज्जाका भाव भी दिखाती है और अपने अङ्गोंको ढीला भी कर देती है।

तीसरी अवस्थामें जब वह पूर्ण युवती हो जाती है ; उसकी उम्र कोई २५।३० साल या इससे अधिक हो जाती है ; तब उसे कन्दर्प-सुखका अनुभव हो जाता है और साथ ही उसका डर भी जाता रहता है। उस वक्त वह प्रेम-रसमें शराबौर होकर अधीर हो जाती है और एकांत स्थलमें रति-केलि करनेकी इच्छा प्रकट करती है। उस समय, कामकलानिपुण अनुभवी और निर्भय होनेसे, वह निर्लज्ज होकर, नाना प्रकारके आसन-भेदों और चुम्बन आदिसे ऐसा सुख देती है कि उसे, गूँगेके सुपनेकी तरह, ज्वान या कलमसे बताना कठिन है।

ऐसा अपूर्व स्वर्गीय सम्भोग-सुख सलज्ज कुलवालाओंसे ही मिल सकता है ; वारवधुओंसे नहीं। निर्लज्ज और निर्भय वाराहूनाओंमें ये आनन्द कहाँ ? क्योंकि कुलवालाओंमें लज्जा है, भय है और प्रेम है ; पर वारवधुओंमें इन तीनोंमेंसे एक भी नहीं। कुलवधुएँ जिस आनन्द और मञ्जेके साथ पुरुषकी काम-पीड़ा और सन्ताप को हर सकती हैं, उस तरह वारवधू नहीं ;

छप्पय ।

ना ना कहि गुण प्रगट करति, श्रमिलाप लाज जूत । शियिल होय धर धीर, प्रेम की इच्छा करि उत ॥