शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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श्रमसे पैदा हुए पसीने आ रहे हों—इस दशामें कोई-कोई भाग्य-शाली ही अपनी प्राणप्यारीके नीचले ओंठका रस पान करती है।
स्त्रिके अधराश्रुत पान करनेमें एक अजीब मज़ा है, तभी तो कविलोग उस मज़ेकी इतनी तारीफ़ करते हैं। उस्ताद जौक भी फ़रमाते हैं—
तेरा जुँबासे मिलाना जुँबा, जो याद आया ।
न हाय हाय मैं, तालूसे फिर जुबान लगी ॥
तेरी जीभसे जीभ मिलाते * या तेरे अधराश्रुत पान करनेका ध्यान जब मुझे आया, तब मैं घण्टों हाय हाय करता रहा, इस लिए मेरी जीभ घण्टोंतक तालुप से न लगी।
छप्पय ।
खुले केश चहुँ ओर, फैल फूलनकी बरसत ।
सद मद छाके नैन, दुरत उधरतसे दसत ॥
सुरत खेदके खेद, कलित सुन्दर कपोल गहि ।
करत अघर रस पान, परत अश्रुत समान लहि ॥
ते धन्य धन्य सुकती पुरुष, जे ऐसे उरके रहत ।
हित भरे रुप यौवन भरे, दम्यति सुख-सम्यति लहत ॥२॥
❁ संस्कृत काव्यमें ज़बान बसनेके बजाय अधराश्रुत हो पान किया जाता है; यानी मुसलमान कवि ज़बान चूसना लिखते हैं और संस्कृत कवि अधराश्रुत पीना ।