भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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कहीं और दूसरेका कहीं हो और सद्गम किया जाय, तो उस सद्गमको स्त्री-पुरुषोंका सद्गम नहीं, बल्कि दो लारोंका सद्गम कह सकते हैं।

समागमके समय यदि दोनोंमेंसे किसी का भी चित्त समागमके लिये उत्कर्षित न हो, तो समागम न करना चाहिये। वैसे समागमसे आनन्द नहीं आता और वृथा बल क्षीण होता है। अगर एक का दिल हो और दूसरेका न हो, तो जिसका दिल हो उसे दूसरेका काम जगाना उचित है। जब दोनों ही कामोन्मत्त होंगे, तब अवश्य दोनों ही का दिल एक हो जायगा। अगर चित्त उद्भिन्न हो, मन मलीन हो और उद्भिन्नता या मलीनता दूर न हो सकती हो, तो समागम न करना ही अच्छा है।

बोसा या चूमा वह शै है, जिसमें चुम्बनेवाले और चूमे जानेवाले दोनोंको ही आनन्द आता है। ऐसा हो नहीं सकता कि, एक को आनन्द आवे और दूसरेको न आवे। कविने कहा है :—

सुँह पै सुँह रखके लिपट जाव तुम्हारे सिदके।

बोसा वह शै है जो दोनोंको मजा देता है ॥

निश्चय ही, चुम्बनमें दोनोंको आनन्द आता है; लेकिन अगर एक का दिल हो और दूसरेका दिल न हो, एक की इच्छा न हो और दूसरा ज़बर्दस्ती करे तो किसीको भी आनन्द नहीं आनेका। पुंश्चली या परपुरुषरता स्त्रियाँ अपने पतियोंको नहीं चाहती;