भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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वैसे समयमें ही गर्भ रह सकता है। जो पुरुष इस तरह काम चैतन्य करके काम-क्रीड़ा करता है, स्त्री उसकी क्रीत-दासी या ज़रूखरीद गुलाम हो जाती है। देखते हैं, बैल, ऊँट, घोड़े, और गधे प्रभृति पशु भी पहले चाट-चूमकर सम्भोग करते हैं, तब मनुष्योंमें तो उनसे कुछ विशेषता होनी ही चाहिये। परमात्माने उन्हें बुद्धि दी है और अनुभव की पुरुषोंने इस विषय पर “अनङ्ग-रङ्ग” “पञ्चशायक” “कोकशास्त्र” “लज्जतुल-निशा” प्रभृति अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। शन्तरेको बन्दर बिना डोले खाता है और चतुर मनुष्य उसे डोलकर और उसका ज़ीरा निकालकर खाता है। प्रत्येक कामके करनेकी कुछ खास-खास तरकीबें हैं। तरकीबोंके साथ जो आनन्द आता है, वह बिना तरकीबोंके नहीं आता। *

हमें फिर कहना पड़ता है कि, बिना तरकीब जाने जो भी काम किये जाते हैं, उनमें सफलता नहीं होती। चतुरा और फूहड़ दोनों ही तरहकी स्त्रियाँ खाना पका लेती हैं, पर चतुराका बनाया हुआ खाना जैसा स्वाद और मज़ेदार होता है, वैसा फूहड़का नहीं होता। हाँ, पेट दोनों ही तरहके भोजनोंसे भर जाता है। चतुराके बनाये भोजनसे तबीयत जैसी खुश होती है, गँवारीके बनाये हुए से वैसी खुश नहीं होती। कामशास्त्रका अभ्यासी जिस तरह संभोग करता है, गँवार उस तरह कर

ॐ ये सब कोंक-सम्बन्धी विषय ज़ागर देखनेका शौक है; तो ज़ागर हमारी किसी “रूपाध्वर(ज्ञा)” देखे। (मूल्य ३) सजिन्द्र का ३॥)

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