भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 144

( १२१ )

नहीं सकता । हाँ, सन्तान दोनोंके ही हो जाती है । चतुराके बनाये हुए भोजन खानेसे रस ठीक बनता है और किसी तरहका रोग नहीं होता ; क्योंकि वह आसानीसे पच जाता है ; पर गँवारीकी मोटी-मोटी कच्ची या जली हुई रोटियोंसे अजीर्ण होता, पेटमें पीड़ा होती और पाक ठीक न होनेसे रस भी ठीक तौरसे नहीं बनता ; इसलिये बल बढ़नेके बजाय उल्टा घटता है । कामशास्त्रका अभ्यासी जो संभोग करता है, उससे स्त्री-पुरुष दोनोंको परमानन्दकी प्राप्ति होती है ; बल घटने नहीं पाता और रोग पास फटकने की हिम्मत नहीं करते । सन्तान भी सुन्दर, रूपवान, बलवान और विद्वान् तथा बुद्धिमान् होती है । किन्तु गँवार, अनजान होनेकी वजहसे, संभोगमें ऐसे काम कर बैठता है, कि जिनसे दिनरात उसका बल क्षीण होता ; प्रमेह, सोड़ाक, नपुंसकता और उपदंश आदि रोग पैदा हो जाते ; तथा जो औलाद पैदा होती है, वह भी गँवार, मूर्ख, मातापिताकी आज्ञा न माननेवाली, कुरूप और असमयमें ही मरजानेवाली पैदा होती है । इसलिये बिना कामशास्त्रका अभ्यास किये स्त्री-भोग करना, अपने जीवन को खराब करना और मृत्युको न्यौता देकर बुलाना है । किसी कविने कहा है :—

दाम्पत्यसुखसिद्धयर्थं कामशास्त्रं समभ्यसेत् । तदभ्यासादनिर्याच्यममन्दानन्दमश्नुते ।