भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १२२ )

कामशास्त्रविहीनांनां रतिः पाशविकी मता । तदभ्यासाच्च सौख्यस्यात् केवलं दुःखमाप्नुयात् ॥

अर्थात् स्त्रीपुरुषका सुख भोगनेके लिए कामशास्त्रका अभ्यास करना जरूरी है। कामशास्त्रके अभ्याससे ही अनिर्वचनीय उत्तम आनन्द मिलता है। कामशास्त्रके बिना जाने-पढ़े जो भोग किया जाता है, वह तो पशुओंका सा सम्भोग है। वैसे सम्भोगसे सुखके बजाय दुःख ही होता है ; यानी सुख नहीं होता, केवल दुःख होता है।

और भी कहा है :—

रतिशास्त्रपरिज्ञान विमूढा ये नराधमाः ।

रतिं स्वरतिहीनायां विधिसन्ति गतायुषः ॥

श्रवश्यं मर्यां तेषां भवेदिति विनिश्चितम् ।

अतोऽपि रतिशास्त्रस्यज्ञानमावश्यकं मतम् ॥

जो गतायु नीच नराधम, कामशास्त्र न जाननेकी वजहसे, अपने तर्ह न चाहनेवाली स्त्रीसे सम्भोग करते या करना चाहते हैं, उनकी उम्र कम हो जाती है यानी वे निश्चय ही असमयमें इस दुनियासे कूच कर जाते हैं, मर जाते हैं ; इसलिये रतिशास्त्रका ज्ञान होना परमावश्यक है।

कामशास्त्रसे किन-किन बातोंका ज्ञान होता है ?

किं दाम्पत्यसुखं लोके कानि तत्साधनानिच

कुमारी परिणीता तु कीदृशी सुखदा भवेत् ॥