शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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आमके रससे मतवाला हुआ कोकिल, सादर, अपनी प्यारी का मुख चूम रहा है। गूँजता हुआ भौरा भी कमल पर बैठ कर अपनी प्यारीकी खूशामद कर रहा है।
औरभी :—
तन्नि पायङ्नि मदालसानि
मुहुर्मुहुर्जुम्भणतपरणि ।
अगान्यनेगः प्रमदानस्य
करोति लावययरसोत्सुकानि ॥
इस श्रुतुमें मीनकेतन—कामदेव, स्त्रियोंके नाज़ुक, गौर, मतवाले और बारम्बार जम्हाइयाँ लेते हुए अङ्गोंको श्रद्धार-रसमें मद्य कर देता है।
बहुत लिखनेको हमारे पास स्थानका अभाव है, इसलिये इतना ही यथेष्ट होगा। बसन्तमें नामर्द भी मर्द हो जाता है। स्त्रियोंको तो इतना मद छ़ा जाता है कि, वे सीना उभार कर और अकड़ कर चलती हैं। रसीले और छेले-छबीले पतियोंके पास रहने पर भी नहीं दबतीं ; बल्कि उत्कण्ठित ही रहा करती हैं।
छप्पय ।
चले सुगन्धित पवन, फूल चहुँ दिशियें फूले ।
बोलत पिक मृदु बचन, काम-शर उरमें शूले ॥
मुकुलित मञ्जरी आम, करै उत्कर्षटा-भारी ।
रतिश्रम स्वेदित बदन, चन्द्रसम श्रद्धुत नारी ॥