भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 158

( १३५ )

हैं। इस ऋतुमें सुगन्धि-मिश्रित पवन चलने लगते हैं। शाखा-प्रशाखाओंमें नवीन पत्राङ्कुर शोभा देने लगते हैं। चारों ओर फूल खिलते हैं। कोकिला मधुर कलरव करती है। साँभ सुहावनी और दिन रमणीय होने लगते हैं। स्त्रियाँ अनुरागिनी होने लगती हैं। बहुत क्या—इस ऋतुमें सभी पदार्थोंमें मनोहरता आ जाती है।

हम अपने पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ महाकवि कालिदास-विरचित “ऋतुसंहार”से चन्द सुन्दर-सुन्दर पद्य उद्धृत करते हैं :—

आकम्पितानि हृद्यानि मनस्विनीनां वतिः प्रफुल्ल सहकार कृताधिवासेः । सम्भावितम्परभृतस्य मदाकुलस्य श्रोत्रप्रियैर्मधुकस्य च गीतनादैः ॥

इस ऋतुमें बौर हुए आमके वृक्षोंकी सुगन्धसे सुगन्धित वायुने धीरज धरनेवाली कामिनियोंके हृदयोंमें भी खलबली मचा दी है। मदोन्मत्त कोकिलोंकी कुहुक और भौरोंके मधुर गुञ्जारसे चारों दिशाए भर गयी हैं।

औरभी :—

पुस्कोकिलश्चूतरसेन मत्तः प्रियामुखं चुम्बति सादरोयम् । गुञ्जद्द्विरेफोऽप्ययमन्मुखस्यः प्रियं प्रियायाः प्रकरोति चाटुम् ॥

शृंगार शतक · पृष्ठ 158, कुल 544 में से · BharatKosha