शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ेंऋतु-वर्णन
वसन्त-महिमा ।
परिमलभृतो वाताः शाखा नवांकुरकोटयो ।
मधुरविरुतोत्कण्ठा वावः प्रियाः पिकपञ्चिणाम् ॥
विरलसुरतस्वेदोद्गारा वृषवृदनेन्दवः ।
प्रसरति मधौ राच्यां जातो न कस्य गुणोदयः ॥३३॥
जबकि सुगन्धयुक्त पवन चला करती है, इक्षुओंकी शाखाओंमें नये-नये अंकुर निकलते हैं, कोकिला मदमत्त या उत्कण्ठित होकर मधुर कलरव करती है, स्त्रियोंके मुखचन्द्र पर मैथुनके परिश्रमसे निकले हुए पसीनोंकी हलकी-हलकी धारें मजा देने लगती हैं, उस वसन्तकी रातमें, किसे काम पीड़ित नहीं करता ? ॥३३॥
खुलासा—वसन्त कामदेवका साथी और ऋतुओंका राजा
❖ मधौ—चैत्र । चैत वसन्तके दो महिनेंमेंसे एकका नाम है, पर यह— यह सारे ही वसन्तके मौसमके लिए इस्तेमाल किया गया है ।