शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
ऋतु-वर्णन
वसन्त-महिमा ।
परिमलभृतो वाताः शाखा नवांकुरकोटयो ।
मधुरविरुतोत्कण्ठा वावः प्रियाः पिकपञ्चिणाम् ॥
विरलसुरतस्वेदोद्गारा वृषवृदनेन्दवः ।
प्रसरति मधौ राच्यां जातो न कस्य गुणोदयः ॥३३॥
जबकि सुगन्धयुक्त पवन चला करती है, इक्षुओंकी शाखाओंमें नये-नये अंकुर निकलते हैं, कोकिला मदमत्त या उत्कण्ठित होकर मधुर कलरव करती है, स्त्रियोंके मुखचन्द्र पर मैथुनके परिश्रमसे निकले हुए पसीनोंकी हलकी-हलकी धारें मजा देने लगती हैं, उस वसन्तकी रातमें, किसे काम पीड़ित नहीं करता ? ॥३३॥
खुलासा—वसन्त कामदेवका साथी और ऋतुओंका राजा
❖ मधौ—चैत्र । चैत वसन्तके दो महिनेंमेंसे एकका नाम है, पर यह— यह सारे ही वसन्तके मौसमके लिए इस्तेमाल किया गया है ।
( १३५ )
हैं। इस ऋतुमें सुगन्धि-मिश्रित पवन चलने लगते हैं। शाखा-प्रशाखाओंमें नवीन पत्राङ्कुर शोभा देने लगते हैं। चारों ओर फूल खिलते हैं। कोकिला मधुर कलरव करती है। साँभ सुहावनी और दिन रमणीय होने लगते हैं। स्त्रियाँ अनुरागिनी होने लगती हैं। बहुत क्या—इस ऋतुमें सभी पदार्थोंमें मनोहरता आ जाती है।
हम अपने पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ महाकवि कालिदास-विरचित “ऋतुसंहार”से चन्द सुन्दर-सुन्दर पद्य उद्धृत करते हैं :—
आकम्पितानि हृद्यानि मनस्विनीनां वतिः प्रफुल्ल सहकार कृताधिवासेः । सम्भावितम्परभृतस्य मदाकुलस्य श्रोत्रप्रियैर्मधुकस्य च गीतनादैः ॥
इस ऋतुमें बौर हुए आमके वृक्षोंकी सुगन्धसे सुगन्धित वायुने धीरज धरनेवाली कामिनियोंके हृदयोंमें भी खलबली मचा दी है। मदोन्मत्त कोकिलोंकी कुहुक और भौरोंके मधुर गुञ्जारसे चारों दिशाए भर गयी हैं।
औरभी :—
पुस्कोकिलश्चूतरसेन मत्तः प्रियामुखं चुम्बति सादरोयम् । गुञ्जद्द्विरेफोऽप्ययमन्मुखस्यः प्रियं प्रियायाः प्रकरोति चाटुम् ॥
( १३६ )
आमके रससे मतवाला हुआ कोकिल, सादर, अपनी प्यारी का मुख चूम रहा है। गूँजता हुआ भौरा भी कमल पर बैठ कर अपनी प्यारीकी खूशामद कर रहा है।
औरभी :—
तन्नि पायङ्नि मदालसानि
मुहुर्मुहुर्जुम्भणतपरणि ।
अगान्यनेगः प्रमदानस्य
करोति लावययरसोत्सुकानि ॥
इस श्रुतुमें मीनकेतन—कामदेव, स्त्रियोंके नाज़ुक, गौर, मतवाले और बारम्बार जम्हाइयाँ लेते हुए अङ्गोंको श्रद्धार-रसमें मद्य कर देता है।
बहुत लिखनेको हमारे पास स्थानका अभाव है, इसलिये इतना ही यथेष्ट होगा। बसन्तमें नामर्द भी मर्द हो जाता है। स्त्रियोंको तो इतना मद छ़ा जाता है कि, वे सीना उभार कर और अकड़ कर चलती हैं। रसीले और छेले-छबीले पतियोंके पास रहने पर भी नहीं दबतीं ; बल्कि उत्कण्ठित ही रहा करती हैं।
छप्पय ।
चले सुगन्धित पवन, फूल चहुँ दिशियें फूले ।
बोलत पिक मृदु बचन, काम-शर उरमें शूले ॥
मुकुलित मञ्जरी आम, करै उत्कर्षटा-भारी ।
रतिश्रम स्वेदित बदन, चन्द्रसम श्रद्धुत नारी ॥
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शृङ्गारशतक
शत्रुराज वसन्त कोकिल के मधुर-मधुर भङ्कार और भलय पवन से विरही स्त्री-पुरुषों के प्राणान्तर करता है। इस चित्र में यह दिखलाया गया है कि, कामिनी का पति घर में नहीं है, विदेश में है। उधर से वसन्त की श्रवाई होगई है, वृत्तों में नये-नये पत्र आ गये हैं, कोकिलकुंडक नहीं है ; अतः विरह-वेदना से व्याकुल कामिनी मन मलीन किये गई है।
( पृष्ठ ८४ )
( १३० )
यह केहि पदार्थके गुणनकों, उदय करत नहि जगत् महीं।
शुठि स्मृतु वमन्तकी है निशा, मंगलदायक सकल कहैं ॥३३॥
सार—बसन्तमें सभीकी उत्कण्ठा और कामवासना बढ़ जाती है।
33. What objects do not assume their qualities in the dead of night of the spring season when the scented breeze blows, new sprouts of leaves come out on the branches of trees, the sweet sound of cuckoo and other birds appear very pleasing and the stray drops of perspiration shine on the moon-like face of women after the exertion of sexual intercourse.
—❧—
मधुरयं मधुरैरपि कोकिला—
कलकलैर्मलयस्य च वायुभिः ॥
विरहिणः प्रणिहन्ति शरीरिणो
विपदि हन्त सुधाऽपि विषायते ॥३४॥
ऋतुराज बसन्त कोकिलके मधुर-मधुर शब्दों और मलय पवनसे बिरही स्त्री-पुरुषोंके प्राण नाश करता है। बड़े ही दुःखका विषय है कि, प्राणियोंके लिये विपद्कालमें ऋतु भी विष हो जाता है ॥३४॥
खुलासा—कोकिलका मधुर कलरव और मलयाचल की सुगन्धिपूर्ण हवा प्राणिमात्रमें नवजीवनका सञ्चार करते हैं।
( १३८ )
इनसे शोकार्त्ता और मनहसोंके दिलोंमें भी गुदगुदी होने लगती है। सभीके चेहरों पर प्रसन्नता छा जाती है ; पर कर्मों के फेर या दुर्दिनके कारणसे, यही दोनों विरही स्त्री-पुरुषोंको मछलीकी तरह तड़फाते हैं। सब है, विपद्कालमें सोना मिट्टी हो जाता है और अमृत विष हो जाता है। पण्डितराज जगन्नाथ अपने “भामिनी-विलास”में कहते हैं :—
मलयानिलमनलीयति मणिभवने काननीयति द्वाणतः ।
विरहेण विकलहृदया निर्जलमीनायते महिला ॥
विरह-वेदनासे विकल कामिनी मलयाचलकी पवनको आग और मणिमय भवनको वन समझकर मछलीका सा आवरण करती है ; यानी जलहीन मछलीकी तरह तड़फती है।
औरभी :—
पाटीरदुमुजंगुंगवमुखायाताइवातापिनो,
वाता वांति दहन्ति लोचनमयी ताप्त्रा रसालदुमाः ।
एते हन्त किरन्ति कृजितमयंहालाहल कोकिलाः, —
बाला बालमृणालकोमलतनुः प्राणान् कथं रक्षतु ॥
चन्दनके वृक्षोंमें बसनेवाले सर्पोंके मुखसे निकली हुई हवाके समान सन्तप्त—गरम हवा चलती है ; लाल-लाल पत्तों वाले आमके वृक्ष नेत्रोंको जलाते हैं ; कोयलकी वाणी विष सा बरसाती है। इस दशामें नवीन कमलकी-डंडीके समान कोमलाङ्गी बाला किस तरह अपनी प्राणरक्षा करेगी ?
( १३६ )
पाठक ! देख लिया, बसन्तमें विरहीजनोंकी कैसी दुर्दशा होती है। विरही स्त्री-पुरुष सभी शीतल और शान्तिमय पदार्थों को अश्रिवत् समझते हैं। विरह-व्याकुला बाला काले अगर और चन्दनके रसको हलाहल विष और नील कमलोंकी मालाको सर्पोंकी कृतार समझने लगती है।
एक विरहिणी बसन्तमें अपने प्रीतमके घर न आने पर स्वपति, कोकिला, कामदेव और चन्द्रमा पर कैसी कुपित हो रही है और उनसे बदला लेनेकी ठान रही है। हम इस मनोहर उक्तिको महाकवि कालिदास-कृत “श्रृङ्गारतिलक”से उद्धृत करते हैं। लीजिये पाठक ! इसका भी रसास्वादन कीजिये :—
आयाता मधुयामिनी यदि पुनर्ना— यात एव प्रभुः प्राण यान्तु विभावसौ यदि पुनर्जन्मप्रहं प्राथये । व्याधःकोकिलबन्धने हिमकर— ध्वंसे च राहुप्रहः कन्दर्पे हरनेत्र- दीधितिर्ह प्रोषोश्चरे मन्यथः ॥
बसन्तकी रात आगई ; पर मेरे स्वामी न आये। इसलिये मेरे प्राण आगमें नष्ट हों। अगर मरनेके बाद फिर जन्म होता हो, तो मैं परमात्मासे प्रार्थना करती हूँ कि, कोकिलके बन्धनके लिये मैं व्याध होऊँ ; चन्द्रमाके नाश करनेके लिये राहु होऊँ ; कामदेवके संहारके लिये शिवजीके नेत्रकी किरण बन्नी और
( १४० )
अपने प्राणप्यारके लिये कामदेव बन्नुं ; अर्थात् बसन्तमें, ये सब मुझे जिस तरह सता रहे हैं ; परकालमें, मैं भी इन्हें सताऊँ और अपना बदला लूँ ।
दोहा ।
सुतु बसन्त कोकिल कुहक, त्यौही पवन श्रृणुप ।
विरह विपतके परत ही, सुवा होय विपरूप ॥३४॥
सार—विरही स्त्री पुरुषोंके लिये “बसन्त” कालके समान है ।
34. This month of Chaitra kills (as it were) those who are suffering from the pangs of separation, by the sweet sound of cuckoo and by the air of Malyachala mountain. Alas! even nectar becomes poison in adversity. (Sweet sound of the cuckoo and the gentle breeze in the spring season please every one—but those whose beloved ones are away feel their absence all the more by these messengers of spring.)
—*—
आवासः किल किञ्चिदेव दयितापारवं विलासालासः
कणै कोकिलकाकलीकलरवः स्मेरो लतामण्डपः ॥
गोष्ठी सत्कविभिः सर्म कतिपयेः सेव्याः सितान्शोः कराः
केषांचित्सुखयन्ति नेत्रहृदये चैवे विचित्राः च्छपाः ॥३४॥
भोगविलाससे शिथिल होकर कुछ समय तक अपनी प्यारीके
( १४१ )
पास आराम करना, कोकिलाओंके मधुर शब्द सुनना, प्रफुल्लित लतामयडपके नीचे टहलना, सुन्दरे कवियोंसे बातचीत करना और चन्द्रमाकी शीतल चाँदनीकी बहार देखना—ऐसी सामग्रीसे चैत्र मासकी विचित्र रात्रियाँ किसी-किसी ही भाग्यवान्के नेत्र और हृदयोंको सुखी करती हैं ॥३५॥
खुलासा—कोयल कुहुकती हो, छताएँ फूल रही हों, चाँदनी छिटक रही हो, श्रेष्ठ कवि अपनी रसीली कविताएँ सुनाते हों और भोग-विलाससे थक कर अपनी प्राणप्यारीके पास आराम कर रहे हों—चैतके महोनेकी रातोंमें, जिन्हें ये सब मयस्सर हों, वे निश्चय ही भाग्यवान हैं। जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्य सञ्चय किये हैं, उन्हें ही ये स्वर्गीय सुख मिलते हैं; सब किसीको नहीं।
दोहा।
कोकिल-रव फूली लता, चैत चाँदनी रैन।
प्रिया सहित निज महलमें, सुकती करत सुचैन ॥३५॥
सार—चैतकी चाँदनी रातमें, विरले पुण्यात्मा ही अपने महलकी छतपर, अपनी प्राणप्यारीके साथ आनन्द करते हैं।
35 These wonderful nights of the month of Chaitra give pleasure to the mind and eyes of a man who enjoys the sweet company of his beloved wife being tired with pleasurable copulation, hears the sweet songs of the cuckoo and takes
( १४२ )
delight in bright moon-light, whose time is passed in company with birds, but to others whose beloved ones are away, these nights give pain.
—*
पान्थस्वीविरहानलाहुतिकथामातन्वती मञ्जरी माकन्देषु पिकांगनाभिरधुना सोत्कण्टमालोक्यते ॥ अध्येते नवपाटलापरिमलभ्रमभारपाटचरा वान्तिक्कान्तिवितानतानवकृताः श्रीखण्डशैलानिलाः ॥३६॥
इस वसन्तमें, जगह-जगह, बटोहियोंकी विरहव्याकुल स्त्रियोंकी विरहाग्निमें आहुतिका काम करनेवाली आमकी मञ्जरियाँ खिल रही हैं। कोकिला उन्हें बड़ी अभिलाष या उत्कंठासे देख रही है। नये पलाशके फूलोंकी सुगन्धको चुरानेवाले और राहकी थकानको मिटानेवाले मलय वायु चल रहे हैं ॥२६॥
यहाँ मृत्युराजकी स्वाभाविक महिमाका चित्र खींचा गया है।
ॐ श्रीखण्डशैल मलयपाचल पर्वतका ही दूसरा नाम है। मलयपाचल भारतको सात मुख्य पर्वत-श्रेणियोंमेंसे एक है। संभवतः, यह वाटोंका दक्षिणीय भाग है, जो मंसूरके दक्षिणसे शुरू होकर ट्रावनकोरकी पूर्वी सीमा बनाता है। कीलहानों साहब कहते हैं, मलयपाचल उस पर्वत-श्रेणीका नाम है जो भारतीय प्रायद्वीपके पश्चिमीय तट पर है, और जहाँ चन्द्रनके वृक्ष बहुतायतसे लगते हैं।
( १४३ )
हम भी अपने मनचले पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ महाकवि कालि- दासके “अतुल्यहार”से एक श्लोक नीचे उद्धृत करते हैं :—
समदमधुकराणां कोकिलानाञ्च नादैः
कुसुमितसहकारैः कर्णिकारैश्च रम्यैः ।
इषुभिरिव सुतीक्ष्णैर्मानस मानिनीनां
तुदति कुसुममासो मन्मथोदीपनाय ॥
यह कुसुम मास मतवाले भौरों, कोकिलके शब्दों, अत्यन्त तेज तीरोंके समान बौर हुए आमके वृक्षों और मनाहर करनेके वृक्षोंके द्वारा, कामोद्दीपन करनेके लिये, मानिनी स्त्रियोंके मनो को विद्व कर रहे हैं ।
छ्पय ।
विरहीजन-मन ताप करन, वन अम्बा मोरे ।
पिकहू पञ्चम हेर टेर, बिरही किये बौर ॥
भौर रहे मबाय, पुहुप पांडलके महकत ।
प्रकुलित भये पलास, दर्शों दिशि दौसी दहकत ॥
मलयगिरिवासी पवनहु, काम धनिन प्रज्वलित करत ।
बिन कृत वसन्त असन्त ज्यों, घेर रखो यह नहि टरत ॥३३॥
सार—आम की मंजरियोंका खिलना, कोकिलाका उन्हें उत्कंठासे देखना और मलय
( १४२ )
delight in bright moon-light, whose time is passed in company with bards, but to others whose beloved ones are away, these nights give pain.
—*—
पान्थस्त्रीविरहानलाहुतिकथामातन्वती मञ्जरी माकन्देषु पिकांगनाभिरधुना सोत्कण्टमालोक्यते ॥ अग्न्येते नवपाटलापरिमलप्रभारपाटचरा वान्तिष्कान्तिवितानतानवक्रताः श्रीखण्डशैलानिलाः ॥३६॥
इस बसन्तमें, जगह-जगह, बटोहियोंकी विरहव्याकुल स्त्रियोंकी विरहाग्निमें आहुतिका काम करनेवाली आमकी मञ्जरियाँ खिल रही हैं। कोकिला उन्हें बड़ी अभिलाष या उत्कंठासे देख रही है। नये पलाशके फूलोंकी सुगन्धको चुरानेवाले और राहकी थकानको मिटानेवाले मलय वायु चल रहे हैं ॥२९॥
यहाँ ऋतुराजकी स्वाभाविक महिमाका चित्र खींचा गया है।
ॐ श्रीखण्डशैल मलयचल पर्वतका ही दूसरा नाम है। मलयचल भारतको सात मुख्य पर्वत-श्रेणियोंमेंसे एक है। संभवतः यह घाटोंका दक्षिणीय भाग है, जो मैसूरके दक्खनसे शुरू होकर द्रावनकोरकी पूर्वी सीमा बनाता है। कीलडार्न साहब कहते हैं, मलयचल उस पर्वत-श्रेणीका नाम है जो भारतीय प्रायद्वीपके पश्चिमीय तट पर है, और जहाँ चन्द्रनके वृक्ष बहुतायतसे लगते हैं।
( १४३ )
हम भी अपने मनचले पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ महाकवि कालि- दासके “श्रतुसंहार”से एक श्लोक नीचे उद्धृत करते हैं :—
समदमधुकरायां कोकिलानाञ्च नादैः
कुसुमितसहकारैः कर्णिकारैश्च रम्यैः ।
इधुभिरिव सुतीक्ष्णैर्मानस मानिनीनां
तुदति कुसुममासो मन्मयोदीपनाय ॥
यह कुसुम मास मतवाले भौरों, कोकिलके शब्दों, अत्यन्त तेज़ तीरोंके समान बौरे हुए आमके वृक्षों और मनोहर करनेके वृक्षोंके द्वारा, कामोदीपन करनेके लिये, मानिनी स्त्रियोंके मनो को विद्ध कर रहे हैं ।
व्यथय ।
चिरहीजन-मन ताप करन, वन अम्बा मोरे ।
पिकहू पञ्चम हेर टेर, बिरही किये वौरे ॥
भौर रहे मबाय, पुहुप पांडलके महकत ।
प्रफुलित भये पलास, दशों दिशि दौसी दहकत ॥
मलयगिरिवासी पवनहु, काम अग्नि प्रज्वलित करत ।
बिन कन्त वसन्त असन्त ज्यों, घेर रही यह नहि टरत ॥३६॥
सार—आम की मंजरियोंका खिलना, कोकिलाका उन्हें उत्कंठासे देखना और मलय
( १४४ )
पवनका चलना,—ये ऋतुराज—वसन्तकी
स्वाभाविक महिमा है।
36. In the spring season, the peahen eagerly looks at the mango blossoms which adds to the flame of separation of a traveller's wife and the air from Malayachala blows stealing the smell of patal flowers and renewing her grief.
—❧—
सहकारकुसुमकेसेरेनिकरभरा मोदमुच्छित्दिगन्ते ।
मधुरमधुविधुरमधुपे मधौ भवेत्कस्य नोत्कण्ठा ॥३७॥
आमके बौरोंकी केसरकी गहरी सुगन्धसे दशों दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं, मधुर मकरन्दको पी-पीकर भौरें उन्मत्त हो रहे हैं—ऐसे ऋतुराज वसन्तमें किसके मनमें कामवासनाका उदय नहीं होता ॥३७॥
खुलासा—जिस समय वसन्तमें आमोंके फूलोंकी सुगन्धसे दिशाएँ महकने लगती हैं, मधुके लोभी भौरें मधु पी-पीकर उन्मत्त हो जाते हैं, उस समय प्रायः सभी प्राणियोंकी विषय-वासना प्रबल हो उठती है। पुरुष स्त्रियोंसे और स्त्रियाँ पुरुषों से मिलनेको तड़फड़ाने लगती हैं। बड़ी-बड़ी मानिनी स्त्रियोंका गर्व खर्व हो जाता है। जो दम्पति एकत्र होते हैं, वे इस ऋतुमें आनन्द करते हैं; परन्तु जो दूर-दूर होते हैं, वे विरहकी आगमें बुरी तरह जलते हैं।
( १४५ )
सोरठा ।
फूलें चहुँ दिशि आम, भई सुगन्धित ठौर सब ।
मधु मधुषी अलिग्राम, मत्त भये भूमत फिरें ॥३७॥
सार---बसन्तमें प्रायः सभी प्राणियोंको कामदेव सताता है ।
37. Who does not feel buoyant in the spring season when all the quarters are filled with smell issuing forth from the bunch of mango-blossoms and when the bees are busy in the collection of sweet honey from flowers ?
—*—
ग्रीष्म-महिमा ।
अच्छाच्छवन्दनरसाद्रिकरा मुगाच्यो
वारागृहाणि कुसुमानि च कौमुदी च ॥
मन्दो मरुत्तुमनसः शुचि हर्म्यपृष्ठं
ग्रीष्मे मद्गुच्छ मद्गुच्छ विवर्द्धयन्ति ॥ ३८ ॥
अत्यन्त सफेद चन्दन जिनके हाथोंमें लग रहा है, ऐसी भुगतथनी सुन्दरियाँ, फव्वारेदार घर, फूल, चाँदनी, मन्दी हवा और
१०
( १४६ )
महलकी साफ छत,—ये सब, गरमीके मौसममें, मद और मदन दोनों हीको बढ़ाते हैं ॥३८॥
खुलासा—भूगनयनीके कमल-समान हाथोंमें अरराजा चन्दन लगा है, फुहारें छूट रहे हैं, फूलों की शय्या बिछी है, चन्द्रमा की चाह चाँदनी छिटक रही है, बीणा बज रहा है, चतुर गवैये गा रहे हैं, महल की स्वच्छ और परिष्कृत छत पर पलंग बिछा रहा है—इस सब सामग्रीसे मद और मदन दोनों की वृद्धि होती है ; अर्थात् जिन पुरुषोंके मनमें विषय-वासना नहीं होती, उनके भी मन इन सामानोंके सामने होनेसे उत्कटित हो जाते हैं ; पर ये सब धनी और राजा महाराजाओं को ही मयस्सर हो सकते हैं । हम अपने पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ चन्द्र सुन्दर-सुन्दर श्लोक महा-कवि कालिदास छत “ऋतुसंहार” से उद्धृत करते हैं :—
( १ )
सचन्दनाम्बु-व्यजनोदभवानिलैः सहारयष्टिस्तनमण्डलापैषैः । सवलुकी-काकलिगीत निस्वनेः प्रवृष्यते सुत इवाद्य मन्मथः ॥८॥
( २ )
निशाः शशांकः क्षतनीरराजयः कचिद् विचित्रं जलवैत्रमन्दिरम्

( ८ ) वर्षा-काल में पति-पत्नी परस्पर आलिङ्गन किये पड़े हैं ।
This is a high-contrast, black-and-white scan of a blank page. The page is mostly white with some faint, illegible markings. A finger is visible on the left edge, and the right edge shows some dark smudges and damage.
( १४७ )
मणिप्रकाराः सरसञ्च चन्दनं शुचौ प्रिये, यान्तिजनस्य सेव्यताम् ॥६॥
( ३ )
पयोधराश्चन्दनपंकशीतला— स्तुधारगोरापितहारशेखराः । नितम्बदेशाश्च सहेम मेखलाः प्रकुर्वन्ते कस्य मनो न सोत्सुकम् ॥१०॥
इस श्रीयम् ऋतुमें, चन्दनके पानीसे भिगोये हुए पट्टे की हवा से, हारयुक्त स्तनमण्डलोंको छातीसे लगानेसे और बीणाके मधुर स्वरके साथ गाना सुननेसे सोया हुआ कामदेव भी चैतन्य हो जाता है ॥१॥
हे प्यारी ! इस आषाढ़के महीनेमें कहीं रात और चन्द्रमा ; कहीं थोड़े जलवाला तालाब और कहीं फुहारिदार घर ; कहीं नाना प्रकारके शीतल रत्न और कहीं सरस चन्दन—मनुष्योंके सेवनीय हो जाते हैं ॥२॥
इस ऋतुमें, बर्फके समान सफेद और उज्ज्वल हार धारण किये चन्दन-वर्चिंत शीतल पयोधर * और सोने की कौंधनी पड़े हुए नितम्ब † जिसके चित्तको उत्कण्ठित नहीं करते ? ॥३॥
- पयोधर = स्तन, वर्चिंता ।
† नितम्ब = कमर का पिछला भाग, चतङ्ग ।