भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पाठक ! देख लिया, बसन्तमें विरहीजनोंकी कैसी दुर्दशा होती है। विरही स्त्री-पुरुष सभी शीतल और शान्तिमय पदार्थों को अश्रिवत् समझते हैं। विरह-व्याकुला बाला काले अगर और चन्दनके रसको हलाहल विष और नील कमलोंकी मालाको सर्पोंकी कृतार समझने लगती है।

एक विरहिणी बसन्तमें अपने प्रीतमके घर न आने पर स्वपति, कोकिला, कामदेव और चन्द्रमा पर कैसी कुपित हो रही है और उनसे बदला लेनेकी ठान रही है। हम इस मनोहर उक्तिको महाकवि कालिदास-कृत “श्रृङ्गारतिलक”से उद्धृत करते हैं। लीजिये पाठक ! इसका भी रसास्वादन कीजिये :—

आयाता मधुयामिनी यदि पुनर्ना— यात एव प्रभुः प्राण यान्तु विभावसौ यदि पुनर्जन्मप्रहं प्राथये । व्याधःकोकिलबन्धने हिमकर— ध्वंसे च राहुप्रहः कन्दर्पे हरनेत्र- दीधितिर्ह प्रोषोश्चरे मन्यथः ॥

बसन्तकी रात आगई ; पर मेरे स्वामी न आये। इसलिये मेरे प्राण आगमें नष्ट हों। अगर मरनेके बाद फिर जन्म होता हो, तो मैं परमात्मासे प्रार्थना करती हूँ कि, कोकिलके बन्धनके लिये मैं व्याध होऊँ ; चन्द्रमाके नाश करनेके लिये राहु होऊँ ; कामदेवके संहारके लिये शिवजीके नेत्रकी किरण बन्नी और