भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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इनसे शोकार्त्ता और मनहसोंके दिलोंमें भी गुदगुदी होने लगती है। सभीके चेहरों पर प्रसन्नता छा जाती है ; पर कर्मों के फेर या दुर्दिनके कारणसे, यही दोनों विरही स्त्री-पुरुषोंको मछलीकी तरह तड़फाते हैं। सब है, विपद्कालमें सोना मिट्टी हो जाता है और अमृत विष हो जाता है। पण्डितराज जगन्नाथ अपने “भामिनी-विलास”में कहते हैं :—

मलयानिलमनलीयति मणिभवने काननीयति द्वाणतः ।

विरहेण विकलहृदया निर्जलमीनायते महिला ॥

विरह-वेदनासे विकल कामिनी मलयाचलकी पवनको आग और मणिमय भवनको वन समझकर मछलीका सा आवरण करती है ; यानी जलहीन मछलीकी तरह तड़फती है।

औरभी :—

पाटीरदुमुजंगुंगवमुखायाताइवातापिनो,

वाता वांति दहन्ति लोचनमयी ताप्त्रा रसालदुमाः ।

एते हन्त किरन्ति कृजितमयंहालाहल कोकिलाः, —

बाला बालमृणालकोमलतनुः प्राणान् कथं रक्षतु ॥

चन्दनके वृक्षोंमें बसनेवाले सर्पोंके मुखसे निकली हुई हवाके समान सन्तप्त—गरम हवा चलती है ; लाल-लाल पत्तों वाले आमके वृक्ष नेत्रोंको जलाते हैं ; कोयलकी वाणी विष सा बरसाती है। इस दशामें नवीन कमलकी-डंडीके समान कोमलाङ्गी बाला किस तरह अपनी प्राणरक्षा करेगी ?