भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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यह केहि पदार्थके गुणनकों, उदय करत नहि जगत् महीं।

शुठि स्मृतु वमन्तकी है निशा, मंगलदायक सकल कहैं ॥३३॥

सार—बसन्तमें सभीकी उत्कण्ठा और कामवासना बढ़ जाती है।

33. What objects do not assume their qualities in the dead of night of the spring season when the scented breeze blows, new sprouts of leaves come out on the branches of trees, the sweet sound of cuckoo and other birds appear very pleasing and the stray drops of perspiration shine on the moon-like face of women after the exertion of sexual intercourse.

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मधुरयं मधुरैरपि कोकिला—

कलकलैर्मलयस्य च वायुभिः ॥

विरहिणः प्रणिहन्ति शरीरिणो

विपदि हन्त सुधाऽपि विषायते ॥३४॥

ऋतुराज बसन्त कोकिलके मधुर-मधुर शब्दों और मलय पवनसे बिरही स्त्री-पुरुषोंके प्राण नाश करता है। बड़े ही दुःखका विषय है कि, प्राणियोंके लिये विपद्कालमें ऋतु भी विष हो जाता है ॥३४॥

खुलासा—कोकिलका मधुर कलरव और मलयाचल की सुगन्धिपूर्ण हवा प्राणिमात्रमें नवजीवनका सञ्चार करते हैं।