शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( १३६ )
पाठक ! देख लिया, बसन्तमें विरहीजनोंकी कैसी दुर्दशा होती है। विरही स्त्री-पुरुष सभी शीतल और शान्तिमय पदार्थों को अश्रिवत् समझते हैं। विरह-व्याकुला बाला काले अगर और चन्दनके रसको हलाहल विष और नील कमलोंकी मालाको सर्पोंकी कृतार समझने लगती है।
एक विरहिणी बसन्तमें अपने प्रीतमके घर न आने पर स्वपति, कोकिला, कामदेव और चन्द्रमा पर कैसी कुपित हो रही है और उनसे बदला लेनेकी ठान रही है। हम इस मनोहर उक्तिको महाकवि कालिदास-कृत “श्रृङ्गारतिलक”से उद्धृत करते हैं। लीजिये पाठक ! इसका भी रसास्वादन कीजिये :—
आयाता मधुयामिनी यदि पुनर्ना— यात एव प्रभुः प्राण यान्तु विभावसौ यदि पुनर्जन्मप्रहं प्राथये । व्याधःकोकिलबन्धने हिमकर— ध्वंसे च राहुप्रहः कन्दर्पे हरनेत्र- दीधितिर्ह प्रोषोश्चरे मन्यथः ॥
बसन्तकी रात आगई ; पर मेरे स्वामी न आये। इसलिये मेरे प्राण आगमें नष्ट हों। अगर मरनेके बाद फिर जन्म होता हो, तो मैं परमात्मासे प्रार्थना करती हूँ कि, कोकिलके बन्धनके लिये मैं व्याध होऊँ ; चन्द्रमाके नाश करनेके लिये राहु होऊँ ; कामदेवके संहारके लिये शिवजीके नेत्रकी किरण बन्नी और
( १४० )
अपने प्राणप्यारके लिये कामदेव बन्नुं ; अर्थात् बसन्तमें, ये सब मुझे जिस तरह सता रहे हैं ; परकालमें, मैं भी इन्हें सताऊँ और अपना बदला लूँ ।
दोहा ।
सुतु बसन्त कोकिल कुहक, त्यौही पवन श्रृणुप ।
विरह विपतके परत ही, सुवा होय विपरूप ॥३४॥
सार—विरही स्त्री पुरुषोंके लिये “बसन्त” कालके समान है ।
34. This month of Chaitra kills (as it were) those who are suffering from the pangs of separation, by the sweet sound of cuckoo and by the air of Malyachala mountain. Alas! even nectar becomes poison in adversity. (Sweet sound of the cuckoo and the gentle breeze in the spring season please every one—but those whose beloved ones are away feel their absence all the more by these messengers of spring.)
—*—
आवासः किल किञ्चिदेव दयितापारवं विलासालासः
कणै कोकिलकाकलीकलरवः स्मेरो लतामण्डपः ॥
गोष्ठी सत्कविभिः सर्म कतिपयेः सेव्याः सितान्शोः कराः
केषांचित्सुखयन्ति नेत्रहृदये चैवे विचित्राः च्छपाः ॥३४॥
भोगविलाससे शिथिल होकर कुछ समय तक अपनी प्यारीके
( १४१ )
पास आराम करना, कोकिलाओंके मधुर शब्द सुनना, प्रफुल्लित लतामयडपके नीचे टहलना, सुन्दरे कवियोंसे बातचीत करना और चन्द्रमाकी शीतल चाँदनीकी बहार देखना—ऐसी सामग्रीसे चैत्र मासकी विचित्र रात्रियाँ किसी-किसी ही भाग्यवान्के नेत्र और हृदयोंको सुखी करती हैं ॥३५॥
खुलासा—कोयल कुहुकती हो, छताएँ फूल रही हों, चाँदनी छिटक रही हो, श्रेष्ठ कवि अपनी रसीली कविताएँ सुनाते हों और भोग-विलाससे थक कर अपनी प्राणप्यारीके पास आराम कर रहे हों—चैतके महोनेकी रातोंमें, जिन्हें ये सब मयस्सर हों, वे निश्चय ही भाग्यवान हैं। जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्य सञ्चय किये हैं, उन्हें ही ये स्वर्गीय सुख मिलते हैं; सब किसीको नहीं।
दोहा।
कोकिल-रव फूली लता, चैत चाँदनी रैन।
प्रिया सहित निज महलमें, सुकती करत सुचैन ॥३५॥
सार—चैतकी चाँदनी रातमें, विरले पुण्यात्मा ही अपने महलकी छतपर, अपनी प्राणप्यारीके साथ आनन्द करते हैं।
35 These wonderful nights of the month of Chaitra give pleasure to the mind and eyes of a man who enjoys the sweet company of his beloved wife being tired with pleasurable copulation, hears the sweet songs of the cuckoo and takes
( १४२ )
delight in bright moon-light, whose time is passed in company with birds, but to others whose beloved ones are away, these nights give pain.
—*
पान्थस्वीविरहानलाहुतिकथामातन्वती मञ्जरी माकन्देषु पिकांगनाभिरधुना सोत्कण्टमालोक्यते ॥ अध्येते नवपाटलापरिमलभ्रमभारपाटचरा वान्तिक्कान्तिवितानतानवकृताः श्रीखण्डशैलानिलाः ॥३६॥
इस वसन्तमें, जगह-जगह, बटोहियोंकी विरहव्याकुल स्त्रियोंकी विरहाग्निमें आहुतिका काम करनेवाली आमकी मञ्जरियाँ खिल रही हैं। कोकिला उन्हें बड़ी अभिलाष या उत्कंठासे देख रही है। नये पलाशके फूलोंकी सुगन्धको चुरानेवाले और राहकी थकानको मिटानेवाले मलय वायु चल रहे हैं ॥२६॥
यहाँ मृत्युराजकी स्वाभाविक महिमाका चित्र खींचा गया है।
ॐ श्रीखण्डशैल मलयपाचल पर्वतका ही दूसरा नाम है। मलयपाचल भारतको सात मुख्य पर्वत-श्रेणियोंमेंसे एक है। संभवतः, यह वाटोंका दक्षिणीय भाग है, जो मंसूरके दक्षिणसे शुरू होकर ट्रावनकोरकी पूर्वी सीमा बनाता है। कीलहानों साहब कहते हैं, मलयपाचल उस पर्वत-श्रेणीका नाम है जो भारतीय प्रायद्वीपके पश्चिमीय तट पर है, और जहाँ चन्द्रनके वृक्ष बहुतायतसे लगते हैं।
( १४३ )
हम भी अपने मनचले पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ महाकवि कालि- दासके “अतुल्यहार”से एक श्लोक नीचे उद्धृत करते हैं :—
समदमधुकराणां कोकिलानाञ्च नादैः
कुसुमितसहकारैः कर्णिकारैश्च रम्यैः ।
इषुभिरिव सुतीक्ष्णैर्मानस मानिनीनां
तुदति कुसुममासो मन्मथोदीपनाय ॥
यह कुसुम मास मतवाले भौरों, कोकिलके शब्दों, अत्यन्त तेज तीरोंके समान बौर हुए आमके वृक्षों और मनाहर करनेके वृक्षोंके द्वारा, कामोद्दीपन करनेके लिये, मानिनी स्त्रियोंके मनो को विद्व कर रहे हैं ।
छ्पय ।
विरहीजन-मन ताप करन, वन अम्बा मोरे ।
पिकहू पञ्चम हेर टेर, बिरही किये बौर ॥
भौर रहे मबाय, पुहुप पांडलके महकत ।
प्रकुलित भये पलास, दर्शों दिशि दौसी दहकत ॥
मलयगिरिवासी पवनहु, काम धनिन प्रज्वलित करत ।
बिन कृत वसन्त असन्त ज्यों, घेर रखो यह नहि टरत ॥३३॥
सार—आम की मंजरियोंका खिलना, कोकिलाका उन्हें उत्कंठासे देखना और मलय
( १४२ )
delight in bright moon-light, whose time is passed in company with bards, but to others whose beloved ones are away, these nights give pain.
—*—
पान्थस्त्रीविरहानलाहुतिकथामातन्वती मञ्जरी माकन्देषु पिकांगनाभिरधुना सोत्कण्टमालोक्यते ॥ अग्न्येते नवपाटलापरिमलप्रभारपाटचरा वान्तिष्कान्तिवितानतानवक्रताः श्रीखण्डशैलानिलाः ॥३६॥
इस बसन्तमें, जगह-जगह, बटोहियोंकी विरहव्याकुल स्त्रियोंकी विरहाग्निमें आहुतिका काम करनेवाली आमकी मञ्जरियाँ खिल रही हैं। कोकिला उन्हें बड़ी अभिलाष या उत्कंठासे देख रही है। नये पलाशके फूलोंकी सुगन्धको चुरानेवाले और राहकी थकानको मिटानेवाले मलय वायु चल रहे हैं ॥२९॥
यहाँ ऋतुराजकी स्वाभाविक महिमाका चित्र खींचा गया है।
ॐ श्रीखण्डशैल मलयचल पर्वतका ही दूसरा नाम है। मलयचल भारतको सात मुख्य पर्वत-श्रेणियोंमेंसे एक है। संभवतः यह घाटोंका दक्षिणीय भाग है, जो मैसूरके दक्खनसे शुरू होकर द्रावनकोरकी पूर्वी सीमा बनाता है। कीलडार्न साहब कहते हैं, मलयचल उस पर्वत-श्रेणीका नाम है जो भारतीय प्रायद्वीपके पश्चिमीय तट पर है, और जहाँ चन्द्रनके वृक्ष बहुतायतसे लगते हैं।
( १४३ )
हम भी अपने मनचले पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ महाकवि कालि- दासके “श्रतुसंहार”से एक श्लोक नीचे उद्धृत करते हैं :—
समदमधुकरायां कोकिलानाञ्च नादैः
कुसुमितसहकारैः कर्णिकारैश्च रम्यैः ।
इधुभिरिव सुतीक्ष्णैर्मानस मानिनीनां
तुदति कुसुममासो मन्मयोदीपनाय ॥
यह कुसुम मास मतवाले भौरों, कोकिलके शब्दों, अत्यन्त तेज़ तीरोंके समान बौरे हुए आमके वृक्षों और मनोहर करनेके वृक्षोंके द्वारा, कामोदीपन करनेके लिये, मानिनी स्त्रियोंके मनो को विद्ध कर रहे हैं ।
व्यथय ।
चिरहीजन-मन ताप करन, वन अम्बा मोरे ।
पिकहू पञ्चम हेर टेर, बिरही किये वौरे ॥
भौर रहे मबाय, पुहुप पांडलके महकत ।
प्रफुलित भये पलास, दशों दिशि दौसी दहकत ॥
मलयगिरिवासी पवनहु, काम अग्नि प्रज्वलित करत ।
बिन कन्त वसन्त असन्त ज्यों, घेर रही यह नहि टरत ॥३६॥
सार—आम की मंजरियोंका खिलना, कोकिलाका उन्हें उत्कंठासे देखना और मलय
( १४४ )
पवनका चलना,—ये ऋतुराज—वसन्तकी
स्वाभाविक महिमा है।
36. In the spring season, the peahen eagerly looks at the mango blossoms which adds to the flame of separation of a traveller's wife and the air from Malayachala blows stealing the smell of patal flowers and renewing her grief.
—❧—
सहकारकुसुमकेसेरेनिकरभरा मोदमुच्छित्दिगन्ते ।
मधुरमधुविधुरमधुपे मधौ भवेत्कस्य नोत्कण्ठा ॥३७॥
आमके बौरोंकी केसरकी गहरी सुगन्धसे दशों दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं, मधुर मकरन्दको पी-पीकर भौरें उन्मत्त हो रहे हैं—ऐसे ऋतुराज वसन्तमें किसके मनमें कामवासनाका उदय नहीं होता ॥३७॥
खुलासा—जिस समय वसन्तमें आमोंके फूलोंकी सुगन्धसे दिशाएँ महकने लगती हैं, मधुके लोभी भौरें मधु पी-पीकर उन्मत्त हो जाते हैं, उस समय प्रायः सभी प्राणियोंकी विषय-वासना प्रबल हो उठती है। पुरुष स्त्रियोंसे और स्त्रियाँ पुरुषों से मिलनेको तड़फड़ाने लगती हैं। बड़ी-बड़ी मानिनी स्त्रियोंका गर्व खर्व हो जाता है। जो दम्पति एकत्र होते हैं, वे इस ऋतुमें आनन्द करते हैं; परन्तु जो दूर-दूर होते हैं, वे विरहकी आगमें बुरी तरह जलते हैं।
( १४५ )
सोरठा ।
फूलें चहुँ दिशि आम, भई सुगन्धित ठौर सब ।
मधु मधुषी अलिग्राम, मत्त भये भूमत फिरें ॥३७॥
सार---बसन्तमें प्रायः सभी प्राणियोंको कामदेव सताता है ।
37. Who does not feel buoyant in the spring season when all the quarters are filled with smell issuing forth from the bunch of mango-blossoms and when the bees are busy in the collection of sweet honey from flowers ?
—*—
ग्रीष्म-महिमा ।
अच्छाच्छवन्दनरसाद्रिकरा मुगाच्यो
वारागृहाणि कुसुमानि च कौमुदी च ॥
मन्दो मरुत्तुमनसः शुचि हर्म्यपृष्ठं
ग्रीष्मे मद्गुच्छ मद्गुच्छ विवर्द्धयन्ति ॥ ३८ ॥
अत्यन्त सफेद चन्दन जिनके हाथोंमें लग रहा है, ऐसी भुगतथनी सुन्दरियाँ, फव्वारेदार घर, फूल, चाँदनी, मन्दी हवा और
१०
( १४६ )
महलकी साफ छत,—ये सब, गरमीके मौसममें, मद और मदन दोनों हीको बढ़ाते हैं ॥३८॥
खुलासा—भूगनयनीके कमल-समान हाथोंमें अरराजा चन्दन लगा है, फुहारें छूट रहे हैं, फूलों की शय्या बिछी है, चन्द्रमा की चाह चाँदनी छिटक रही है, बीणा बज रहा है, चतुर गवैये गा रहे हैं, महल की स्वच्छ और परिष्कृत छत पर पलंग बिछा रहा है—इस सब सामग्रीसे मद और मदन दोनों की वृद्धि होती है ; अर्थात् जिन पुरुषोंके मनमें विषय-वासना नहीं होती, उनके भी मन इन सामानोंके सामने होनेसे उत्कटित हो जाते हैं ; पर ये सब धनी और राजा महाराजाओं को ही मयस्सर हो सकते हैं । हम अपने पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ चन्द्र सुन्दर-सुन्दर श्लोक महा-कवि कालिदास छत “ऋतुसंहार” से उद्धृत करते हैं :—
( १ )
सचन्दनाम्बु-व्यजनोदभवानिलैः सहारयष्टिस्तनमण्डलापैषैः । सवलुकी-काकलिगीत निस्वनेः प्रवृष्यते सुत इवाद्य मन्मथः ॥८॥
( २ )
निशाः शशांकः क्षतनीरराजयः कचिद् विचित्रं जलवैत्रमन्दिरम्

( ८ ) वर्षा-काल में पति-पत्नी परस्पर आलिङ्गन किये पड़े हैं ।
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( १४७ )
मणिप्रकाराः सरसञ्च चन्दनं शुचौ प्रिये, यान्तिजनस्य सेव्यताम् ॥६॥
( ३ )
पयोधराश्चन्दनपंकशीतला— स्तुधारगोरापितहारशेखराः । नितम्बदेशाश्च सहेम मेखलाः प्रकुर्वन्ते कस्य मनो न सोत्सुकम् ॥१०॥
इस श्रीयम् ऋतुमें, चन्दनके पानीसे भिगोये हुए पट्टे की हवा से, हारयुक्त स्तनमण्डलोंको छातीसे लगानेसे और बीणाके मधुर स्वरके साथ गाना सुननेसे सोया हुआ कामदेव भी चैतन्य हो जाता है ॥१॥
हे प्यारी ! इस आषाढ़के महीनेमें कहीं रात और चन्द्रमा ; कहीं थोड़े जलवाला तालाब और कहीं फुहारिदार घर ; कहीं नाना प्रकारके शीतल रत्न और कहीं सरस चन्दन—मनुष्योंके सेवनीय हो जाते हैं ॥२॥
इस ऋतुमें, बर्फके समान सफेद और उज्ज्वल हार धारण किये चन्दन-वर्चिंत शीतल पयोधर * और सोने की कौंधनी पड़े हुए नितम्ब † जिसके चित्तको उत्कण्ठित नहीं करते ? ॥३॥
- पयोधर = स्तन, वर्चिंता ।
† नितम्ब = कमर का पिछला भाग, चतङ्ग ।
( १४८ )
छप्पय ।
मृगनैनीके हाथ, अरगजा चन्दन लावत ।
कुटत फुहारे देख, पुष्प-शय्या विरमावत ॥
चारु चैंदनी चन्द, मन्द मारुतको ऐने ।
बाजत वीन प्रवीण, संग गायनको गैवो ॥
चैंदन उजरे महलकी, निरखत चितगति हितढरत ।
पुरुषनको यौष्म विषमये, ये मद-मदनहि विस्तरत ॥३८॥
37 Ladies having their hands besmeared with purest sandal water, houses having fountains playing therein, sweet smelling flowers, bright moon-light, fragrant creepers, the gentle breeze and the white roof of the palaces—these things in summer season, increase sensual desires.
—❧—
सजो ह्यामोदा व्यजनपवनश्रन्दक्रिएणाः
परागः कासारो मलयजरजः सीधु विशदम् ॥
शुचिः सौवोत्संगः पतनु वसनं पंकजदशो
निदावे तूर्णं तत्सुखमुखपलभन्तं सुकृतिनः ॥३८॥
मनोहर सुगन्धित माला, पंखेकी हवा, चन्द्रमाकी किरणें, फूलोंका पराग, सरोवर, चन्दनकी रज, उत्तम मंदिरा, महलकी उत्तम छत, महीन वस्त्र और कमलनयनी सुन्दरी—इन सब उत्तमोत्तम पदार्थोंका, गरमीकी तेजीसे विकल हुए, कोई-कोई भाग्यवान पुरुष ही मजा ले सकते हैं ॥३९॥
( १४६ )
खुलासा—गरमी की ऋतुमें—फूलों की माला, पट्टों की हवा, चार चाँदनी और कमलनेत्री कामिनी प्रभृति शीतल और शान्ति-मय पदार्थोंका भोग कोई-कोई पुण्यवान ही कर सकते हैं। सबके लिये ये स्वर्गीय आनन्दके देनेवाले सामान मयस्सर हो नहीं सकते। जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्य किया है, उनके ऊपर विष्णु-प्रिया लक्ष्मी की रूपा है, वे ही इनका सुख लूट सकते हैं।
दोहा ।
पुष्पमाल पंखा-पवन, चन्दन चन्द सुनारि ।
बैठ चाँदनी जल लहर, जेठमास पट धारि ॥३६॥
39 In summer season, it is only the fortunate people who derive pleasure by the enjoyment of the following—sweet smelling garlands, air of fans, moon-light, pollens of flowers, tanks, sandal dust, pure wine, white terrace of big palaces, fine clothes and the lotus-eyed beautiful maiden
—❧—
सथाशुभं धाम स्फुरद्भलररिमः यशधरः
प्रियावक्त्रात्मोजं मलयजरजश्चातिसुरभिः ।
वज्रो ह्यामोदास्तदिदमखिलं रागिणि जनै
करोत्यन्तः चोभं त यु विषयमंसर्गविमुखे ॥४०॥
• लिला-पुता साफ महल, निर्मल किरणोंवाला चन्द्रमा, प्यारीका सुखकमल, चन्दनकी रज और मनोहर फूलमाला—ये सब चीजें
( १४८ )
छप्पय ।
मृगनैनीके हाथ, अरगजा चन्दन लावत ।
छुटत फुहारे देख, पुष्प-शय्या बिरमावत ॥
चारु चैंदनी चन्द, मन्द मारुतको ऐवो ।
बाजत वीन प्रवीण, संग गायनको गैवो ॥
चैंदन उजरे महलकी, निरखत चितगति हितढरत ।
पुरुषनको यीष्म विषममें, ये मद-मदनहि विस्तरत ॥३८॥
37 Ladies having their hands besmeared with purest sandal water, houses having fountains playing therein, sweet smelling flowers, bright moon-light, fragrant creepers, the gentle breeze and the white roof of the palaces—these things in summer season, increase sensual desires.
—❧—
लजो ह्यामोदा व्यजनपवनश्रन्दक्रिरणाः
परागः कासारो मलयजरजः सीधु विशदम् ॥
शुचिः सौवोत्संगः पतनु वसन् पंकजदृशो
निदावे तूर्णं तत्सुखमुखपलभन्तं सुकृतिनः ॥३८॥
मनोहर सुगन्धित माला, पंखेकी हवा, चन्द्रमाकी किरणें, फूलोंका पराग, सरोवर, चन्दनकी रज, उत्तम मंदिरा, महलकी उत्तम छत, महीन वस्त्र और कमलनयनी सुन्दरी—इन सब उत्तमोत्तम पदार्थोंका, गरमीकी तेजीसे विकल हुए, कोई-काई भाग्यवान पुरुष ही भुजा ले सकते हैं ॥३९॥
( १४६ )
खुलासा—गरमी की ऋतुमें—फूलों की माला, पट्टे की हवा, चार चाँदनी और कमलनेत्री कामिनी प्रभृति शीतल और शान्ति-मय पदार्थोंका भोग कोई-कोई पुण्यवान ही कर सकते हैं। सबके लिये ये स्वर्गीय आनन्दके देनेवाले सामान मयस्सर हो नहीं सकते। जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्य किया है, जिनके ऊपर विष्णु-प्रिया लक्ष्मी की कृपा है, वे ही इनका सुख लूट सकते हैं।
दोहा ।
पुष्पमाल पंखा-पवन, चन्दन चन्द सुनारि ।
वैठ चाँदनी जल लहर, जेठमास पट धारि ॥३६॥
39 In summer season, it is only the fortunate people who derive pleasure by the enjoyment of the following—sweet smelling garlands, air of fans, moon-light, pollens of flowers, tanks, sandal dust, pure wine, white terrace of big palaces, fine clothes and the lotus-eyed beautiful maiden
—❧—
सुधाशुभ्रं धाम स्फुरदमलरमिः शशधरः
प्रियावक्त्रात्मोजं मलयजरजश्चातिपुरमिः ।
लजो ह्यामोदास्तादिदमखिलं रागिणि जने
क्रोत्यन्तः लोभं त यु विषयसंसर्गविमुखे ॥४०॥
• लिपा-पुता साफ महल, निर्मल किरणोंवाला चन्द्रमा, प्यारीका सुवकमल, चन्दनकी रज और मनोहर फूलमाला—ये सब चीजें
( १५० )
कामी पुरुषोंके मनमें अत्यन्त क्रोध करती है ; किन्तु विषय-वासना-से विमुख पुरुषोंके हृदयोंमें किसी प्रकारका क्रोध उत्पन्न नहीं करती ॥ ४० ॥
खुलासा—जो अनुरागी हैं—कामी है, उनके दिलोंमें स्वच्छ महल, निर्मल सुधाकर की रश्मियाँ, पुष्पमाला, खसके पट्टों की हवा, फव्वारोंका चलना, चन्द्रनकी रज, वीणाका मधुर स्वर, सुरीले कण्ठोंका मनोहर गान प्रभृति शीतल, पर कामोत्तेजक, पदार्थ एक प्रकारकी हलचलसी मचा देते हैं । इनसे उनकी काम-वासना—भोगविलास की इच्छा और भी प्रबल हो जाती है ; परन्तु जो संसारसे उदासीन हैं, जिन्हें विरक्ति हो गई है, जिन्हें संसार की असास्ता और चञ्चलताका ज्ञान हो गया है, उनके दिलोंमें इन सब कामोत्तेजक पदार्थोंसे कुछ भी हलचल नहीं मचती । उनके लिये तो स्वच्छ महल और श्मशान, चाँदनी रात और घोर अँधेरीरात, पुष्पमाला और सर्पमाला, चन्द्रन की रज और श्मशान की राख तथा कामिनियोंकी जुलके और भयंकर कालसर्प प्रभृति सब बराबर हैं ।
दोहा ।
शशिबदनी अरु शरद शशि, चन्द्रन-पुष्प-सुगन्ध ।
ये रसिकनके चित हस्त, सन्तनके चित वन्ध ॥४०॥
सार—चारु चाँदनी, चन्द्रमुखी प्रिया एवं

( ९ ) शरद-ऋतु की चाँदनी रात में, रति-श्रम से थकी हुई प्यारी के हाथों से लाई हुई झारी का जल पीते हुए महाराज भर्तृहरि ।
( १५२ )
मनोहर बाल होते हैं ; उसी तरह वर्षा-रूपिणी तरुणीके बालोंकी जगह मालतीकी लतायें होती हैं । जिस तरह तरुणीके शरीरसे सुगन्धित तेल और इत्र वगैरः की खुशबू उड़ा करती है ; उसी तरह वर्षा-रूपिणी तरुणीके शरीरसे भी नाना प्रकारके फूलोंकी सुगन्धि आया करती है । जिस तरह तरुणी स्त्रीके सघन पीन पयोधर होते हैं ; उसी तरह वर्षा-रूपिणी तरुणीके भी सघन मेघ पीन पयोधर होते हैं । जिस तरह तरुणी स्त्री पुरुषके मनमें उत्कण्ठा—विषय-वासना उत्पन्न करती है ; उसी तरह वर्षा भी उत्कण्ठा उत्पन्न करती है । मतलब यह तरुणी नारी और वर्षामें कोई भेद नहीं ; दोनों हर तरह समान हैं । कविने ठीक ही कहा है कि, वर्षा-रूपिणी तरुणीके दर्शनोंसे कौन हर्षित नहीं होता, जो पूर्ण विकसित जाती पुष्पोंको सुगन्ध और सघन मेघोंके उत्थानसे मनुष्यके मनमें काम उत्पन्न करती है ? “भामिनी विलास”में लिखा है—
प्रादुर्भवति पयोदे कञ्जलमलिनं बभूव नभः ।
रक्तं च पथिकं हृदयं कपोलपाली मृगीदृशः पांडुः ॥
बादलोंके आकाशमें छानेसे आकाश काजलके समान मलिन हो गया, पथिकका हृदय अनुरागसे भर उठा और मृगनयनीके गालोंपर जूदीं छा गयीं ।
सारंश यह है कि, वर्षाभ्रतुके आते ही स्त्री-पुरुषोंका चित्त प्रसन्न हो जाता है और उन दोनोंकी ही विषय-भोग भोगने की