भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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हम भी अपने मनचले पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ महाकवि कालि- दासके “श्रतुसंहार”से एक श्लोक नीचे उद्धृत करते हैं :—

समदमधुकरायां कोकिलानाञ्च नादैः

कुसुमितसहकारैः कर्णिकारैश्च रम्यैः ।

इधुभिरिव सुतीक्ष्णैर्मानस मानिनीनां

तुदति कुसुममासो मन्मयोदीपनाय ॥

यह कुसुम मास मतवाले भौरों, कोकिलके शब्दों, अत्यन्त तेज़ तीरोंके समान बौरे हुए आमके वृक्षों और मनोहर करनेके वृक्षोंके द्वारा, कामोदीपन करनेके लिये, मानिनी स्त्रियोंके मनो को विद्ध कर रहे हैं ।

व्यथय ।

चिरहीजन-मन ताप करन, वन अम्बा मोरे ।

पिकहू पञ्चम हेर टेर, बिरही किये वौरे ॥

भौर रहे मबाय, पुहुप पांडलके महकत ।

प्रफुलित भये पलास, दशों दिशि दौसी दहकत ॥

मलयगिरिवासी पवनहु, काम अग्नि प्रज्वलित करत ।

बिन कन्त वसन्त असन्त ज्यों, घेर रही यह नहि टरत ॥३६॥

सार—आम की मंजरियोंका खिलना, कोकिलाका उन्हें उत्कंठासे देखना और मलय