भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पवनका चलना,—ये ऋतुराज—वसन्तकी

स्वाभाविक महिमा है।

36. In the spring season, the peahen eagerly looks at the mango blossoms which adds to the flame of separation of a traveller's wife and the air from Malayachala blows stealing the smell of patal flowers and renewing her grief.

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सहकारकुसुमकेसेरेनिकरभरा मोदमुच्छित्दिगन्ते ।

मधुरमधुविधुरमधुपे मधौ भवेत्कस्य नोत्कण्ठा ॥३७॥

आमके बौरोंकी केसरकी गहरी सुगन्धसे दशों दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं, मधुर मकरन्दको पी-पीकर भौरें उन्मत्त हो रहे हैं—ऐसे ऋतुराज वसन्तमें किसके मनमें कामवासनाका उदय नहीं होता ॥३७॥

खुलासा—जिस समय वसन्तमें आमोंके फूलोंकी सुगन्धसे दिशाएँ महकने लगती हैं, मधुके लोभी भौरें मधु पी-पीकर उन्मत्त हो जाते हैं, उस समय प्रायः सभी प्राणियोंकी विषय-वासना प्रबल हो उठती है। पुरुष स्त्रियोंसे और स्त्रियाँ पुरुषों से मिलनेको तड़फड़ाने लगती हैं। बड़ी-बड़ी मानिनी स्त्रियोंका गर्व खर्व हो जाता है। जो दम्पति एकत्र होते हैं, वे इस ऋतुमें आनन्द करते हैं; परन्तु जो दूर-दूर होते हैं, वे विरहकी आगमें बुरी तरह जलते हैं।