शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( १४४ )
पवनका चलना,—ये ऋतुराज—वसन्तकी
स्वाभाविक महिमा है।
36. In the spring season, the peahen eagerly looks at the mango blossoms which adds to the flame of separation of a traveller's wife and the air from Malayachala blows stealing the smell of patal flowers and renewing her grief.
—❧—
सहकारकुसुमकेसेरेनिकरभरा मोदमुच्छित्दिगन्ते ।
मधुरमधुविधुरमधुपे मधौ भवेत्कस्य नोत्कण्ठा ॥३७॥
आमके बौरोंकी केसरकी गहरी सुगन्धसे दशों दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं, मधुर मकरन्दको पी-पीकर भौरें उन्मत्त हो रहे हैं—ऐसे ऋतुराज वसन्तमें किसके मनमें कामवासनाका उदय नहीं होता ॥३७॥
खुलासा—जिस समय वसन्तमें आमोंके फूलोंकी सुगन्धसे दिशाएँ महकने लगती हैं, मधुके लोभी भौरें मधु पी-पीकर उन्मत्त हो जाते हैं, उस समय प्रायः सभी प्राणियोंकी विषय-वासना प्रबल हो उठती है। पुरुष स्त्रियोंसे और स्त्रियाँ पुरुषों से मिलनेको तड़फड़ाने लगती हैं। बड़ी-बड़ी मानिनी स्त्रियोंका गर्व खर्व हो जाता है। जो दम्पति एकत्र होते हैं, वे इस ऋतुमें आनन्द करते हैं; परन्तु जो दूर-दूर होते हैं, वे विरहकी आगमें बुरी तरह जलते हैं।
( १४५ )
सोरठा ।
फूलें चहुँ दिशि आम, भई सुगन्धित ठौर सब ।
मधु मधुषी अलिग्राम, मत्त भये भूमत फिरें ॥३७॥
सार---बसन्तमें प्रायः सभी प्राणियोंको कामदेव सताता है ।
37. Who does not feel buoyant in the spring season when all the quarters are filled with smell issuing forth from the bunch of mango-blossoms and when the bees are busy in the collection of sweet honey from flowers ?
—*—
ग्रीष्म-महिमा ।
अच्छाच्छवन्दनरसाद्रिकरा मुगाच्यो
वारागृहाणि कुसुमानि च कौमुदी च ॥
मन्दो मरुत्तुमनसः शुचि हर्म्यपृष्ठं
ग्रीष्मे मद्गुच्छ मद्गुच्छ विवर्द्धयन्ति ॥ ३८ ॥
अत्यन्त सफेद चन्दन जिनके हाथोंमें लग रहा है, ऐसी भुगतथनी सुन्दरियाँ, फव्वारेदार घर, फूल, चाँदनी, मन्दी हवा और
१०
( १४६ )
महलकी साफ छत,—ये सब, गरमीके मौसममें, मद और मदन दोनों हीको बढ़ाते हैं ॥३८॥
खुलासा—भूगनयनीके कमल-समान हाथोंमें अरराजा चन्दन लगा है, फुहारें छूट रहे हैं, फूलों की शय्या बिछी है, चन्द्रमा की चाह चाँदनी छिटक रही है, बीणा बज रहा है, चतुर गवैये गा रहे हैं, महल की स्वच्छ और परिष्कृत छत पर पलंग बिछा रहा है—इस सब सामग्रीसे मद और मदन दोनों की वृद्धि होती है ; अर्थात् जिन पुरुषोंके मनमें विषय-वासना नहीं होती, उनके भी मन इन सामानोंके सामने होनेसे उत्कटित हो जाते हैं ; पर ये सब धनी और राजा महाराजाओं को ही मयस्सर हो सकते हैं । हम अपने पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ चन्द्र सुन्दर-सुन्दर श्लोक महा-कवि कालिदास छत “ऋतुसंहार” से उद्धृत करते हैं :—
( १ )
सचन्दनाम्बु-व्यजनोदभवानिलैः सहारयष्टिस्तनमण्डलापैषैः । सवलुकी-काकलिगीत निस्वनेः प्रवृष्यते सुत इवाद्य मन्मथः ॥८॥
( २ )
निशाः शशांकः क्षतनीरराजयः कचिद् विचित्रं जलवैत्रमन्दिरम्

( ८ ) वर्षा-काल में पति-पत्नी परस्पर आलिङ्गन किये पड़े हैं ।
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( १४७ )
मणिप्रकाराः सरसञ्च चन्दनं शुचौ प्रिये, यान्तिजनस्य सेव्यताम् ॥६॥
( ३ )
पयोधराश्चन्दनपंकशीतला— स्तुधारगोरापितहारशेखराः । नितम्बदेशाश्च सहेम मेखलाः प्रकुर्वन्ते कस्य मनो न सोत्सुकम् ॥१०॥
इस श्रीयम् ऋतुमें, चन्दनके पानीसे भिगोये हुए पट्टे की हवा से, हारयुक्त स्तनमण्डलोंको छातीसे लगानेसे और बीणाके मधुर स्वरके साथ गाना सुननेसे सोया हुआ कामदेव भी चैतन्य हो जाता है ॥१॥
हे प्यारी ! इस आषाढ़के महीनेमें कहीं रात और चन्द्रमा ; कहीं थोड़े जलवाला तालाब और कहीं फुहारिदार घर ; कहीं नाना प्रकारके शीतल रत्न और कहीं सरस चन्दन—मनुष्योंके सेवनीय हो जाते हैं ॥२॥
इस ऋतुमें, बर्फके समान सफेद और उज्ज्वल हार धारण किये चन्दन-वर्चिंत शीतल पयोधर * और सोने की कौंधनी पड़े हुए नितम्ब † जिसके चित्तको उत्कण्ठित नहीं करते ? ॥३॥
- पयोधर = स्तन, वर्चिंता ।
† नितम्ब = कमर का पिछला भाग, चतङ्ग ।
( १४८ )
छप्पय ।
मृगनैनीके हाथ, अरगजा चन्दन लावत ।
कुटत फुहारे देख, पुष्प-शय्या विरमावत ॥
चारु चैंदनी चन्द, मन्द मारुतको ऐने ।
बाजत वीन प्रवीण, संग गायनको गैवो ॥
चैंदन उजरे महलकी, निरखत चितगति हितढरत ।
पुरुषनको यौष्म विषमये, ये मद-मदनहि विस्तरत ॥३८॥
37 Ladies having their hands besmeared with purest sandal water, houses having fountains playing therein, sweet smelling flowers, bright moon-light, fragrant creepers, the gentle breeze and the white roof of the palaces—these things in summer season, increase sensual desires.
—❧—
सजो ह्यामोदा व्यजनपवनश्रन्दक्रिएणाः
परागः कासारो मलयजरजः सीधु विशदम् ॥
शुचिः सौवोत्संगः पतनु वसनं पंकजदशो
निदावे तूर्णं तत्सुखमुखपलभन्तं सुकृतिनः ॥३८॥
मनोहर सुगन्धित माला, पंखेकी हवा, चन्द्रमाकी किरणें, फूलोंका पराग, सरोवर, चन्दनकी रज, उत्तम मंदिरा, महलकी उत्तम छत, महीन वस्त्र और कमलनयनी सुन्दरी—इन सब उत्तमोत्तम पदार्थोंका, गरमीकी तेजीसे विकल हुए, कोई-कोई भाग्यवान पुरुष ही मजा ले सकते हैं ॥३९॥
( १४६ )
खुलासा—गरमी की ऋतुमें—फूलों की माला, पट्टों की हवा, चार चाँदनी और कमलनेत्री कामिनी प्रभृति शीतल और शान्ति-मय पदार्थोंका भोग कोई-कोई पुण्यवान ही कर सकते हैं। सबके लिये ये स्वर्गीय आनन्दके देनेवाले सामान मयस्सर हो नहीं सकते। जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्य किया है, उनके ऊपर विष्णु-प्रिया लक्ष्मी की रूपा है, वे ही इनका सुख लूट सकते हैं।
दोहा ।
पुष्पमाल पंखा-पवन, चन्दन चन्द सुनारि ।
बैठ चाँदनी जल लहर, जेठमास पट धारि ॥३६॥
39 In summer season, it is only the fortunate people who derive pleasure by the enjoyment of the following—sweet smelling garlands, air of fans, moon-light, pollens of flowers, tanks, sandal dust, pure wine, white terrace of big palaces, fine clothes and the lotus-eyed beautiful maiden
—❧—
सथाशुभं धाम स्फुरद्भलररिमः यशधरः
प्रियावक्त्रात्मोजं मलयजरजश्चातिसुरभिः ।
वज्रो ह्यामोदास्तदिदमखिलं रागिणि जनै
करोत्यन्तः चोभं त यु विषयमंसर्गविमुखे ॥४०॥
• लिला-पुता साफ महल, निर्मल किरणोंवाला चन्द्रमा, प्यारीका सुखकमल, चन्दनकी रज और मनोहर फूलमाला—ये सब चीजें
( १४८ )
छप्पय ।
मृगनैनीके हाथ, अरगजा चन्दन लावत ।
छुटत फुहारे देख, पुष्प-शय्या बिरमावत ॥
चारु चैंदनी चन्द, मन्द मारुतको ऐवो ।
बाजत वीन प्रवीण, संग गायनको गैवो ॥
चैंदन उजरे महलकी, निरखत चितगति हितढरत ।
पुरुषनको यीष्म विषममें, ये मद-मदनहि विस्तरत ॥३८॥
37 Ladies having their hands besmeared with purest sandal water, houses having fountains playing therein, sweet smelling flowers, bright moon-light, fragrant creepers, the gentle breeze and the white roof of the palaces—these things in summer season, increase sensual desires.
—❧—
लजो ह्यामोदा व्यजनपवनश्रन्दक्रिरणाः
परागः कासारो मलयजरजः सीधु विशदम् ॥
शुचिः सौवोत्संगः पतनु वसन् पंकजदृशो
निदावे तूर्णं तत्सुखमुखपलभन्तं सुकृतिनः ॥३८॥
मनोहर सुगन्धित माला, पंखेकी हवा, चन्द्रमाकी किरणें, फूलोंका पराग, सरोवर, चन्दनकी रज, उत्तम मंदिरा, महलकी उत्तम छत, महीन वस्त्र और कमलनयनी सुन्दरी—इन सब उत्तमोत्तम पदार्थोंका, गरमीकी तेजीसे विकल हुए, कोई-काई भाग्यवान पुरुष ही भुजा ले सकते हैं ॥३९॥
( १४६ )
खुलासा—गरमी की ऋतुमें—फूलों की माला, पट्टे की हवा, चार चाँदनी और कमलनेत्री कामिनी प्रभृति शीतल और शान्ति-मय पदार्थोंका भोग कोई-कोई पुण्यवान ही कर सकते हैं। सबके लिये ये स्वर्गीय आनन्दके देनेवाले सामान मयस्सर हो नहीं सकते। जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्य किया है, जिनके ऊपर विष्णु-प्रिया लक्ष्मी की कृपा है, वे ही इनका सुख लूट सकते हैं।
दोहा ।
पुष्पमाल पंखा-पवन, चन्दन चन्द सुनारि ।
वैठ चाँदनी जल लहर, जेठमास पट धारि ॥३६॥
39 In summer season, it is only the fortunate people who derive pleasure by the enjoyment of the following—sweet smelling garlands, air of fans, moon-light, pollens of flowers, tanks, sandal dust, pure wine, white terrace of big palaces, fine clothes and the lotus-eyed beautiful maiden
—❧—
सुधाशुभ्रं धाम स्फुरदमलरमिः शशधरः
प्रियावक्त्रात्मोजं मलयजरजश्चातिपुरमिः ।
लजो ह्यामोदास्तादिदमखिलं रागिणि जने
क्रोत्यन्तः लोभं त यु विषयसंसर्गविमुखे ॥४०॥
• लिपा-पुता साफ महल, निर्मल किरणोंवाला चन्द्रमा, प्यारीका सुवकमल, चन्दनकी रज और मनोहर फूलमाला—ये सब चीजें
( १५० )
कामी पुरुषोंके मनमें अत्यन्त क्रोध करती है ; किन्तु विषय-वासना-से विमुख पुरुषोंके हृदयोंमें किसी प्रकारका क्रोध उत्पन्न नहीं करती ॥ ४० ॥
खुलासा—जो अनुरागी हैं—कामी है, उनके दिलोंमें स्वच्छ महल, निर्मल सुधाकर की रश्मियाँ, पुष्पमाला, खसके पट्टों की हवा, फव्वारोंका चलना, चन्द्रनकी रज, वीणाका मधुर स्वर, सुरीले कण्ठोंका मनोहर गान प्रभृति शीतल, पर कामोत्तेजक, पदार्थ एक प्रकारकी हलचलसी मचा देते हैं । इनसे उनकी काम-वासना—भोगविलास की इच्छा और भी प्रबल हो जाती है ; परन्तु जो संसारसे उदासीन हैं, जिन्हें विरक्ति हो गई है, जिन्हें संसार की असास्ता और चञ्चलताका ज्ञान हो गया है, उनके दिलोंमें इन सब कामोत्तेजक पदार्थोंसे कुछ भी हलचल नहीं मचती । उनके लिये तो स्वच्छ महल और श्मशान, चाँदनी रात और घोर अँधेरीरात, पुष्पमाला और सर्पमाला, चन्द्रन की रज और श्मशान की राख तथा कामिनियोंकी जुलके और भयंकर कालसर्प प्रभृति सब बराबर हैं ।
दोहा ।
शशिबदनी अरु शरद शशि, चन्द्रन-पुष्प-सुगन्ध ।
ये रसिकनके चित हस्त, सन्तनके चित वन्ध ॥४०॥
सार—चारु चाँदनी, चन्द्रमुखी प्रिया एवं

( ९ ) शरद-ऋतु की चाँदनी रात में, रति-श्रम से थकी हुई प्यारी के हाथों से लाई हुई झारी का जल पीते हुए महाराज भर्तृहरि ।
( १५२ )
मनोहर बाल होते हैं ; उसी तरह वर्षा-रूपिणी तरुणीके बालोंकी जगह मालतीकी लतायें होती हैं । जिस तरह तरुणीके शरीरसे सुगन्धित तेल और इत्र वगैरः की खुशबू उड़ा करती है ; उसी तरह वर्षा-रूपिणी तरुणीके शरीरसे भी नाना प्रकारके फूलोंकी सुगन्धि आया करती है । जिस तरह तरुणी स्त्रीके सघन पीन पयोधर होते हैं ; उसी तरह वर्षा-रूपिणी तरुणीके भी सघन मेघ पीन पयोधर होते हैं । जिस तरह तरुणी स्त्री पुरुषके मनमें उत्कण्ठा—विषय-वासना उत्पन्न करती है ; उसी तरह वर्षा भी उत्कण्ठा उत्पन्न करती है । मतलब यह तरुणी नारी और वर्षामें कोई भेद नहीं ; दोनों हर तरह समान हैं । कविने ठीक ही कहा है कि, वर्षा-रूपिणी तरुणीके दर्शनोंसे कौन हर्षित नहीं होता, जो पूर्ण विकसित जाती पुष्पोंको सुगन्ध और सघन मेघोंके उत्थानसे मनुष्यके मनमें काम उत्पन्न करती है ? “भामिनी विलास”में लिखा है—
प्रादुर्भवति पयोदे कञ्जलमलिनं बभूव नभः ।
रक्तं च पथिकं हृदयं कपोलपाली मृगीदृशः पांडुः ॥
बादलोंके आकाशमें छानेसे आकाश काजलके समान मलिन हो गया, पथिकका हृदय अनुरागसे भर उठा और मृगनयनीके गालोंपर जूदीं छा गयीं ।
सारंश यह है कि, वर्षाभ्रतुके आते ही स्त्री-पुरुषोंका चित्त प्रसन्न हो जाता है और उन दोनोंकी ही विषय-भोग भोगने की
( १५३ )
इच्छा प्रबल हो उठती है । इस श्रुतुमें केवल उन्हींका चित्त हर्षित और उत्कण्ठित नहीं हो सकता, जो संसारसे उदासीन या पुंसत्त्व-विहीन हैं ।
दोहा ।
पीन एयोवरकों धरत, प्रगट धरत है काम ।
पावस अरु प्यारी निरख, हर्षित होत तमाम ॥४१॥
41. Who does not feel pleasure in the rainy season which has all the qualities of a young woman, gives rise to amorous desires, bears the smell of blossomed jessamine flowers and has swollen heavy clouds over it?
—३—
वियदुपचितमेव भूमयः कन्दलिन्यो ।
नवकुटजकदम्बामोदिनो गन्धवाहाः ॥
शिविकुलकलकेकारावरम्पा वतान्ताः
सुखिनमसुखिनं वा सर्वमुत्कण्ठयन्ति ॥४२॥
मेवोंसे आच्छादित आकाश, नवीन-नवीन अंकुरोंसे पूर्ण पृथ्वी, नवीन कुटज और कदम्बके फूलोंसे सुगन्धित वायु और मेलोंके सुगन्धकी मनोहर वाणीसे रमणीय वनप्रान्त,—वर्षामें, सुखी और दुखी दोनों तरहके पुरुषोंको उत्कण्ठित करते हैं ॥४२॥
खुलासा—हर शब्द सका मन चाहे वह सुखी हो चाहे दुखी, धनधोर घटाओं, नये-नये अंकुरोंसे छायी पृथ्वी एवं कुटज और
( १५४ )
कदमके फूलोंकी सुगन्धसे सुवासित पवन और मोरोंकी मधुर वाणीसे पूर्ण मनोहर वनोंको देखकर उत्कण्ठित होता ही है।
वर्षाकी नेत्रोंको प्रसन्न करनेवाली, मन और आत्माकी तृप्ति करनेवाली, शीतलता और शान्तिका सञ्चार करनेवाली छविपर कोई विरला ही मनहूस न मोहित होता होगा। इस ऋतुमें बड़े-बड़े मानी पुरुषों और मानिनी स्त्रियोंके मान मर्दन हो जाते हैं। दोनों ही मान त्याग कर, एक दूसरेकी ख़शामद करने लगते हैं। भारी-से-भारी अपराधके अपराधी पतियोंको भुगनयनी स्त्रियाँ सहजमें क्षमा प्रदान कर देती हैं। देखिये महाकवि कालिदास अपने “ऋतु संहार”में कहते हैं :—
( ? )
पयोधरैर्भीमगम्भीरनिस्वने- स्तडिद्रुभिर्द्वेजितचेतसो भृशम् । कृतापराधानपि योषितः प्रियान् परिष्वजन्ते शयने निरन्तरम् ॥
( २ )
कालागुरुप्रचुरचंदन-चर्चितोगयः पुष्पावतंससुरभीकृतकेशपाशाः श्रुत्वा ध्वनिं जलमुचां त्वरितप्रदोषे शय्यागृहं गुरुगृहात्प्रविशन्ति नाथ्यः ॥
( १५५ )
वर्षामें, ख़ियाँ भयंकर और गम्भीर गर्जना करनेवाले मेघों और चम्भाचम चमकती हुई बिजलियोंसे डर-डर कर अपराधी पतियोंको भी, शय्या पर, बारम्बार आलिङ्गन करने लगती हैं ; अर्थात् भयभीत होकर पतियोंके शरीरसे विपटने लगती हैं ।
वर्षाकी रातोंमें, बादलोंकी घोर गर्जना सुन-सुन कर, ख़ियाँ अपने शरीरोंमें अगर और चन्दनका लेप कर, पूलोंके गहनोंसे चेष्टियोंको सजा और सुगन्धित कर, घरके काम-धन्धे जल्दी-जल्दी निपटा, सासके घरसे अपने सोनेके कमरोंमें शीघ्र ही चली जाती हैं ।
पण्डितराज जगन्नाथ एक मानिनीके सम्बन्धमें क्या खूब कहते हैं :—
मुन्डसि नाद्यापि रुषं भामिनि ! मुदिरालिरुदियाय ।
इतिशुद्धः प्रियवचनैरपायि नयनाञ्ज कोणशोण रुचिः ॥
हे भामिनी ! आकाशमें मेघमाला छा गई है, किन्तु तू अब तक अपना रोष नहीं त्यागती ? प्रियतमके इन वचनोंसे कमल-नयनीके नयन-कमलके कोनेमें जो ललाई आ गई थी, वह दूर हो गई ; अर्थात् वह अपने प्यारसे राजी हो गई ।
दोहा ।
श्रम्बर घन श्रवनी हरित, कुटज कदम्ब सुगन्ध ।
मोर शोर रमणीक वन, सबको सुख सम्बन्ध ॥४१॥
( १५६ )
सार—वर्षामें दुखिया और सुखिया सभी
के मनमें कामवासना उदय हो आता है ।
42. The sky overcast with clouds, the earth full of new sprouts, the air fragrant with the smell of newly-blossomed Kutaja and Kadamba flowers and the forest pleasant on account of the charm- ing voice of peacocks,—all these give rise to amorous feelings in the hearts of happy and the unhappy men alike.
—*—
उपरि धनं धनपटलं तिर्यगिरयोरपि नर्तितमयूराः ।
वसुधा कंदलधवला तुरिष्ठे पथिकः कयातु संलप्तः ॥४३॥
सिरके ऊपर धनवोर घटयें छा रही हैं, दाहिने-बायें दोनों तरफके पहाड़ोंपर मोर नाच रहे हैं ; पैरोंके नीचेकी जमीन नवीन अंकुरोंसे हरी हो रही है—ऐसे समयमें जबकि चारों ओर कामोद्दीपन करनेवाले सामान नज़र आते हैं, विरह-व्याकुल पथिकको कैसे सन्तोष हो सकता है ? ॥४३॥
खुलासा—सिर पर मेघोंका शामियाना, पैरोंके नीचे हरी-हरी दूबका कालीन और अगल-बगलमें मद्भस्त मोरोंका नाचना देखकर, बटोहीके मनमें प्यारीसे मिलनेकी उत्कट अभिलाष दुष्ट बिन नहीं रहती । वह बहुत-कुछ धीरज धरता है, पर जब चारों ओर कामोद्दीपक पदार्थोंको देखता है, तब फिर अधीर हो जाता है । बहुत लिखनेसे क्या—वर्षामें विरही
( १५७ )
जनोंको बड़ा क्लेश होता है। देखिये महाकवि कालिदास कहते हैं —
बलाहकाश्चाशनिशब्दमहलाः
सुरेन्द्रचापं दक्षतस्तद्विदुगुणम् ।
सुतीक्ष्णधारा-पतनोप्रसायका—
स्तुदति चेतः प्रसभं प्रवासिनाम् ॥
इन दिनों, ब्रजके शब्दरूपी नगाड़ेवाले बिजलीकी डोरीसे युक्त इन्द्रधनु धारण किये, तीव्र धाराके वृष्टि-रूपी भयंकर वाणवाले ( वीर ) बादल प्रवासियोंके चित्तको बरबस व्यथित कर देते हैं।
यह तो हुई पुरुषोंकी बात ; अब ज़रा परदेशमें रहनेवालोंकी प्राणव्यारियोंके दुःख और कष्टकी बात भी सुनिये :—
विलोचनेन्दीवर—वारि—विन्दुभि—
निषिक्त—विम्बाधर—चारुपल्लवाः
निरस्त माल्याभरणानुलेपनाः
स्थिता निराशाः प्रमदाः प्रवासिनाम् ॥
वर्षामें, विदेशमें रहनेवालोंकी स्त्रियाँ अपने नयन-कमलोंके जलविन्दुओंसे अपने विम्बाफलके समान-सुन्दर अधर-पल्लवों—छोटों—को भिगोये, हार प्रभृति गहने और चन्दन आगर प्रभृतिका अनुलेपन त्यागे, पतिके आनेकी आशा छोड़ ( मनमारे ) बैठी हुई हैं।
( १५८ )
दोहा ।
घटा घोर चढ़ मोर गिरि, शोह हरित सब भूम ।
विरही व्याकुल पथिकको, कहाँ तोष लखि घूमि ॥४३॥
सार—विरही स्त्री-पुरुषोंको जिस तरह वसन्तमें घोर मनोवेदना और व्यथा होती है ; उसी तरह वर्षामें भी उनको विरहाग्नि की तीव्र ज्वालामें जल-जल कर मछली की तरह तड़फना पड़ता है ।
43. How can a poor traveller feel pleasure (in the rainy season) when the thick clouds gather above, the peacocks dance on the mountain on both sides and the earth is white with new sprouts sprinkling with rain water? (He feels his loneliness and the absence of his beloved wife.)
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इतो विद्युद्गुल्मीविलासितमितिः केतकित्रोः
स्फुरद्गन्धः पोषज्जलदनिनदस्फूर्जितमितिः ।
इतः केकिकीडाकलकलरवः पद्मलहशं
कथं यास्यन्त्येते विरहदिवसाः संश्रुतरसाः ॥४४॥
एक ओर चपलाका चमाचम चमकना, दूसरी ओर केतकीके फूलोंकी मनोहर सुगंध ; एक ओर मेघकी गर्जजन और दूसरी ओर
( १५६ )
मोरोंका शोर,—ये सब जहाँ एकत हैं, वहाँ सुनयनी विरह-व्याकुला खिंघा अपने रस-पूर्ण विरहके दिनोंको कैसे वितायेंगी ! ॥४४॥
खुलासा—आकाशमें घनघोर घटाये घिर आई हैं ; बिजली भस्माभ्रम कर रही है, बादलोंकी भयंकर गर्जना हो रही है, केतकीके मनोहर फूलोंकी सुगन्ध उड़ रही है, मतवाले मोर शोर कर रहे हैं ; हाय ! कामकला-प्रवीण सुनयनी तरुणियोंके, ये कामवासनाको बढ़ानेवाले दिन किस तरह कटेंगे ? क्योंकि उनके प्राणवल्लभ घरों पर नहीं हैं । जब वे अंधेरी रातोंमें बादलोंकी हृदय दहलानेवाली आवाजों और बिजलीकी भयंकर कड़कसे भयभीत होंगी, तब कौन उन्हें छातीसे लगाकर उनका भय मिटावेगा ? जब वे चारों ओर कामोद्दीपन करनेवाले सामान देखकर काम-पीड़ित होंगी, तब कौन उनकी काम-शान्ति करेगा ?
दोहा ।
दमकत दामिनि मेष इत, केतकि-पुष्प-विकाश ।
मोर शोर निशिदिन करत, विरहीजन मन त्रास ॥४४॥
सार—वर्षामें प्रवासी पतियोंकी पतिव्रता स्त्रियोंके दिन बड़ी ही मुसीबतमें कटते हैं ।
44. How would the women separated from their lovers pass those wet days when there is the flash of lightening here and the