भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पृष्ठ 187

( १५६ )

सार—वर्षामें दुखिया और सुखिया सभी

के मनमें कामवासना उदय हो आता है ।

42. The sky overcast with clouds, the earth full of new sprouts, the air fragrant with the smell of newly-blossomed Kutaja and Kadamba flowers and the forest pleasant on account of the charm- ing voice of peacocks,—all these give rise to amorous feelings in the hearts of happy and the unhappy men alike.

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उपरि धनं धनपटलं तिर्यगिरयोरपि नर्तितमयूराः ।

वसुधा कंदलधवला तुरिष्ठे पथिकः कयातु संलप्तः ॥४३॥

सिरके ऊपर धनवोर घटयें छा रही हैं, दाहिने-बायें दोनों तरफके पहाड़ोंपर मोर नाच रहे हैं ; पैरोंके नीचेकी जमीन नवीन अंकुरोंसे हरी हो रही है—ऐसे समयमें जबकि चारों ओर कामोद्दीपन करनेवाले सामान नज़र आते हैं, विरह-व्याकुल पथिकको कैसे सन्तोष हो सकता है ? ॥४३॥

खुलासा—सिर पर मेघोंका शामियाना, पैरोंके नीचे हरी-हरी दूबका कालीन और अगल-बगलमें मद्भस्त मोरोंका नाचना देखकर, बटोहीके मनमें प्यारीसे मिलनेकी उत्कट अभिलाष दुष्ट बिन नहीं रहती । वह बहुत-कुछ धीरज धरता है, पर जब चारों ओर कामोद्दीपक पदार्थोंको देखता है, तब फिर अधीर हो जाता है । बहुत लिखनेसे क्या—वर्षामें विरही

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