भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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वर्षामें, ख़ियाँ भयंकर और गम्भीर गर्जना करनेवाले मेघों और चम्भाचम चमकती हुई बिजलियोंसे डर-डर कर अपराधी पतियोंको भी, शय्या पर, बारम्बार आलिङ्गन करने लगती हैं ; अर्थात् भयभीत होकर पतियोंके शरीरसे विपटने लगती हैं ।

वर्षाकी रातोंमें, बादलोंकी घोर गर्जना सुन-सुन कर, ख़ियाँ अपने शरीरोंमें अगर और चन्दनका लेप कर, पूलोंके गहनोंसे चेष्टियोंको सजा और सुगन्धित कर, घरके काम-धन्धे जल्दी-जल्दी निपटा, सासके घरसे अपने सोनेके कमरोंमें शीघ्र ही चली जाती हैं ।

पण्डितराज जगन्नाथ एक मानिनीके सम्बन्धमें क्या खूब कहते हैं :—

मुन्डसि नाद्यापि रुषं भामिनि ! मुदिरालिरुदियाय ।

इतिशुद्धः प्रियवचनैरपायि नयनाञ्ज कोणशोण रुचिः ॥

हे भामिनी ! आकाशमें मेघमाला छा गई है, किन्तु तू अब तक अपना रोष नहीं त्यागती ? प्रियतमके इन वचनोंसे कमल-नयनीके नयन-कमलके कोनेमें जो ललाई आ गई थी, वह दूर हो गई ; अर्थात् वह अपने प्यारसे राजी हो गई ।

दोहा ।

श्रम्बर घन श्रवनी हरित, कुटज कदम्ब सुगन्ध ।

मोर शोर रमणीक वन, सबको सुख सम्बन्ध ॥४१॥

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