भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १५४ )

कदमके फूलोंकी सुगन्धसे सुवासित पवन और मोरोंकी मधुर वाणीसे पूर्ण मनोहर वनोंको देखकर उत्कण्ठित होता ही है।

वर्षाकी नेत्रोंको प्रसन्न करनेवाली, मन और आत्माकी तृप्ति करनेवाली, शीतलता और शान्तिका सञ्चार करनेवाली छविपर कोई विरला ही मनहूस न मोहित होता होगा। इस ऋतुमें बड़े-बड़े मानी पुरुषों और मानिनी स्त्रियोंके मान मर्दन हो जाते हैं। दोनों ही मान त्याग कर, एक दूसरेकी ख़शामद करने लगते हैं। भारी-से-भारी अपराधके अपराधी पतियोंको भुगनयनी स्त्रियाँ सहजमें क्षमा प्रदान कर देती हैं। देखिये महाकवि कालिदास अपने “ऋतु संहार”में कहते हैं :—

( ? )

पयोधरैर्भीमगम्भीरनिस्वने- स्तडिद्रुभिर्द्वेजितचेतसो भृशम् । कृतापराधानपि योषितः प्रियान् परिष्वजन्ते शयने निरन्तरम् ॥

( २ )

कालागुरुप्रचुरचंदन-चर्चितोगयः पुष्पावतंससुरभीकृतकेशपाशाः श्रुत्वा ध्वनिं जलमुचां त्वरितप्रदोषे शय्यागृहं गुरुगृहात्प्रविशन्ति नाथ्यः ॥